भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३८२ रसतरङ्गिणी रजनीपुनर्नवाख्यं खलु शृङ्गवेरवारा । विनियोजितं सुवर्णं विनिहन्ति मुष्कशोथम् ॥ ११६ ॥ अथ सुवर्णभस्मन आमयिकः प्रयोगः प्राचीनतन्त्रनिर्दिष्टप्रायः प्रकटित आचार्यैः-रक्ताङ्गं रक्तचन्दनम्, तुङ्गः पुन्नागः पद्मकेशरो वा, उत्पलं नीलोत्पलम्, यष्टी मधुयष्टी, समङ्गा मञ्जिष्ठा, रुधिरं कुङ्कुमम्, आदिपदेन रक्तशोथकवचचो- पचीन्यादिद्रव्यपरिग्रहः । गायत्री खदिरः । रिष्टप्रादुर्भावेऽन्यः प्रयोगोऽपि तन्त्रान्तरे “मध्वामलकचूर्णन्तु सुवर्णञ्चेति तत्समम् । प्राश्यारिष्टगृहीतोऽपि मुच्यते प्राण- सङ्कटात्” इति । मेधाभिवृद्धिं जनयेन्नितान्तमिति । उक्तं हि “मेधाकामस्तु वचया श्रीकामः पद्मकेसरैः । शङ्खपुष्प्या वयोऽर्थी च विदार्या च प्रजार्थकः ॥” इति च । स्थिरा शालपर्णी, विदारी स्वनामख्याता शुक्रकन्दः, वरदा अश्वगन्धा, अजरा कपिकच्छुः । जीवनीयागणाः—“जीवन्तीकाकोल्यौ मेदे द्वे मुद्गमाषपर्ण्यौ च । ऋषभकजीवकमधुकं चेति गणो जीवनीयाख्यः ॥” इत्युक्तः । काकोल्यादिगणः- “काकोल्यौ मधुकं शृङ्गी मेदे द्वे जीवकर्षभौ । प्रपौण्डरीकमृद्वीका ऋद्धिवृद्धि- स्तुगासहा । पयस्या पञ्चकं छिन्नैत्येष वर्गोऽतिबृंहणः । स्तन्यश्च जीवनीयश्च पित्तास्रा- निलनाशनः ॥” इत्युक्तः । निर्विषी तदाख्यः क्षुद्रकन्दविशेषः । जटिला जटा- मांसी । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ८२–११६ ॥ इति सुवर्णविज्ञानीयो नाम पञ्चदशस्तरङ्गः । भा.टी.—वातप्रकोपयुक्त ज्वर में स्वर्णभस्म को समभाग रससिन्दूर के साथ पीसकर वेल की छाल के स्वरस के साथ सेवन करने से उसमें आराम आता है । पित्तज्वर में स्वर्णभस्म में रससिन्दूर मिलाकर पित्तपापड़े के स्वरस के साथ सेवन कराया जाता है । इसी तरह कफज्वर को दूर करने के लिये स्वर्ण को रससिन्दूर में मिलाकर तुलसीस्वरस अनुपान से सेवन करना चाहिये । जीर्ण- ज्वर में स्वर्णभस्म और अभ्रकभस्म मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से शीघ्र ही आराम आता है । स्वर्णभस्म को रसपर्पटी में मिलाकर उचित अनुपान तथा सहपान के साथ कुछ काल सेवन करने से पुरानी संग्रहणी में अवश्य ही लाभ होता है । गुडूचीसत्त्व, स्वर्णभस्म और लोहभस्म को एकत्र मिलाकर उचित अनुपान से सेवन करने पर नवीन तथा पुरातन दोनों प्रकार का पाण्डुरोग दूर हो जाता है । स्वर्णभस्म में अभ्रकभस्म, रस- सिन्दूर और मुक्तापिष्टी मिलाकर सेवन करने से भयंकर राजयक्ष्मा में आराम आता है । गर्भाशय शुद्धि के लिये स्वर्णभस्म को क्षीरकाकोली और चोप-