रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशस्तरङ्गः ३८६ भा.टी.—चाँदी के वर्क शीतवीर्य, स्वाद में कषाय और आम्लरस, सर, विपाक में मधुर, बलवर्धक, स्निग्ध, रुचिकारक, लेखन, शुक्रप्रमेहनाशक, आयुष्य, वयःस्थापक, वृष्य, मेधावर्धक, विशेषतः वातपित्त-प्रकोपशामक होते हैं ॥ १४–१५ ॥ रजतपटलनां प्रयोगः ताम्बूलवीटिकादौ वा मिष्टान्नेषु विशेषतः । साम्प्रतं विनियुज्यन्ते चन्द्रलोहदलानि तु ॥ १६ ॥ भा.टी.—चाँदी के वर्कों को आजकल पान के बीड़े पर लपेटकर अथवा मिठाइयों पर लपेट कर खाया जाता है ॥ १६ ॥ वक्तव्य—शुक्रप्रमेह में इनको खाँड आदि के साथ निश्चन्द्र होने तक पीस कर प्रयोग किया जाता है अथवा प्रमेहहर गोलियों के बाहर चाँदी के वर्कों से लपेट कर खिलाया जाता है । हृद्रोग और अधिक गर्मी को शान्त करने के लिये वर्कों को आँवले आदि मुरब्बे के साथ लपेट कर खाया जाता है । रजतस्य प्रथमो मारणप्रकारः कर्षद्वयमितं तारं विशुद्धन्तु समाहरेत् । रसेश्वरं तत्तुल्यं निर्मलञ्च हरेद्भिषक् ॥ १७ ॥ खल्वे सम्पेष्य यत्नेन पिष्टिकां कारयेत्ततः । निम्बूकस्वरसं दत्त्वा दिनमेकं सुपेषयेत् ॥ १८ ॥ ततः प्रक्षालयेत्कामं सलिलेन भिषग्वरः । शुद्धं सौगन्धिकं तुल्यं तथैव नटभूषणम् ॥ १९ ॥ निक्षिप्य चाथ सम्पेष्य श्लक्ष्णचूर्णाञ्च कारयेत् । शरावसम्पुटे न्यस्य पुटेत्स्वल्पपुटे ततः ॥ २० ॥ एवं पञ्चावरैश्च रजतं मृतिमाप्नुयात् । भस्मसञ्जायते चैव रक्तोत्पलसमप्रभम् ॥ २१ ॥ रजतस्यात्रो मारणप्रकारः—प्रक्षालयेत् कामं सलिलेन इति पिष्टिनैर्मल्या- र्थम् । सम्पुटशरावकान्तलग्नन्तु रजतभस्म सावधानतया विलेख्यमिति । उक्तं हि—"विधाय पिष्टिं सूतेन रजतस्याथ मेलयेत् । तालं गन्धं समं शुद्धं तन्मर्द्यं निम्बुकद्रवैः ॥ गोलकीकृत्य संशुद्धं मूषायां स्वर्णवद् दृढम् । द्वित्रैः पुटैर्भवेद् भस्म योज्यमेतद् रसादिषु ॥" इति ॥ १७–२१ ॥ भा.टो.—दो कर्ष परिमाण शुद्ध चाँदी को लेकर उसमें दो कर्ष शुद्ध पारद मिलाकर खरल में घोटकर इसकी पीठी सी बना लें । अब इस पीठी को नींबू के