भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 414

३८८ रसतरङ्गिणी आलवाल बनावे, उसी बीच में चांदी का टुकड़ा ( पत्र ) रखे और चाँदी के मान के बराबर शुद्ध सीसा देकर कलछुल से चलावे । जब देख ले कि सीसा तथा चांदी दोनों गल गया तब शुद्ध सोहागा का चूर्ण इच्छानुसार देने से सीसा मर जाता है और धूमरहित हो जाता है । पात्रतल में नीचे बैठे हुए शुद्ध रौप्य भाग का भस्मादि कार्यों में प्रयोग किया जाता है ॥ ७-६ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः पत्तलीकृतपत्राणि राजतानि भिषग्वरः । वह्नौ प्रतापयेत्कामं वङ्कनालप्रदीपिते ॥१०॥ ततो निम्बूकजद्रावे चाङ्गेरीस्वरसेऽपि वा । स्नपयेत्तप्ततप्तानि भूयो भूयः प्रयत्नतः ॥११॥ यावद्राजतपत्राणि मार्दवं यान्ति निर्भरम् । वीतशङ्कस्ततो वैद्यो मारणाय प्रयोजयेत् ॥१२॥ तृतीयः शोधनप्रकारः—सर्वदा सुलभक्रमः । वीतशङ्कः अशुद्धिशङ्का- रहितः ॥ १०-१२ ॥ भा.टी.—चाँदी के पतले २ पत्र बनाकर कोष्ठी के ऊपर कोयलों की अग्नि में वंकनाल से हवा करते हुए तपायें । जब पत्र तपकर लाल हो जायँ तो उन्हें चिमटे से पकड़कर नींबूरस में बुझा दें । इस प्रकार तब तक पत्रों को तपाकर नींबूरस में बुझाते रहें जब तक कि वे पर्याप्त मुलायम न हो जायँ । इस प्रकार शुद्ध किये हुए रजत को निःशंक होकर भस्म कर सकते हैं ॥ १०-१२ ॥ अथ रजतदलस्य नामानि चन्द्रलोहदलं चैव स्मृतं रजतमण्डलम् । तदेव तारपटलं मतं तारदलञ्च तत् ॥१३॥ रजतदलं खण्डादिना सह निश्चन्द्रं यावन्निष्पेष्य शुक्रमेहादौ प्रयोज्यम् ॥१३॥ भा.टी.—चाँदी के वर्कों को चन्द्रलोहदल, रजतमण्डल, तारपटल और तारदल नाम से कहा जाता है ॥ १३ ॥ अस्य गुणाः चन्द्रलोहदलं शीतं तुवराम्लरसं सरम् । विपाकमधुरं बल्यं स्निग्धं रुच्यञ्च लेखनम् ॥१४॥ शुक्रमेहघ्नमायुष्यं वयःस्थापनमुत्तमम् । वृष्यं मेध्यं विशेषेण वातपित्तप्रणाशनम् ॥१५॥