भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३६८ रसतरङ्गिणी अण्डाधारगदस्यैताः प्रोक्ता आकृतयो बुधैः ॥” इत्युक्तः । गर्भाशयाज्जायमानमि- त्यादिना तु “Membraneus Dysmenorrhœa” इत्याख्यस्य रोगस्योप- वर्णनं विनाशयत्ययं योगः । कृमिघ्नो विडङ्गः । रक्तं कुङ्कुमम् ॥५५-७५॥ भा.टी.-पुरातन कोष्ठगत वायुप्रकोप में रजतभस्म को अजवाइन और लौँगचूर्ण के साथ कुछ दिन सेवन करने से लाभ होता है । पुरातन अजीर्ण से होनेवाले हृदयकंपन में रजतभस्म को इलायचीचूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से लाभ होता है। सूर्यावर्त तथा अर्धावभेदक (आधासीसी) रोग में रजतभस्म को इलायचीबीजचूर्ण और मिश्री के साथ प्रयोग कराया जाता है। रजतभस्म को रससिन्दूर, लोहभस्म, शिलाजीत और स्वर्णमाक्षिकभस्म में मिलाकर कुछ काल सेवन करने से वामडिम्बाशय (ovary) में उत्पन्न तीव्र वेदना के साथ गर्भाशयभ्रंश में शीघ्र ही आराम आता है। इसका अनुपान त्रिफलाक्वाथ होना चाहिये । टंकणपुष्प, अभ्रकभस्म तथा रससिन्दूर के साथ रजतभस्म को खरैंटी और त्रिफलाक्वाथ से सेवन करने पर वामडिम्बाशय में उत्पन्न होनेवाली तीव्र पीड़ायुक्त डिम्बग्रन्थि रोग में विशेष रूप से लाभ होता है। अत्यन्त क्षतयुक्त दुर्गन्धित स्राववाले गर्भाशयसंकोच में रजतभस्म को रससिन्दूर और सुहागे में मिलाकर हरिद्रास्वरस से दो सप्ताह निरन्तर सेवन करने से निश्चित लाभ होता है । रजतभस्म में लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म और रससिन्दूर मिलाकर अजवाइन और चित्रकमूल क्वाथ के साथ सेवन से गृध्रसी (Sytica), विश्वाची, त्रिकवे- दना और शरीर के विभिन्न स्थानों में होनेवाले नाड़ीशूल में आराम आता है । शाखा-(रसरक्तादि धातु) गत पित्तप्रकोप को शान्त करने के लिए रजतभस्म को पित्तपापड़ा, खस, धनियाँ आदि पित्तनाशक औषधियों के क्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है। मदात्यय रोग को नष्ट करने के लिए विशेषतः उसके वातिकलक्षणों को दूर करने के लिये रजतभस्म को लाजवर्तभस्म के साथ सेवन कराने से आराम आता है । पेट में होनेवाले पुराने आध्मानरोग को शांत करने के लिए रजतभस्म को चोपचीनीचूर्ण या कपाय के साथ प्रयोग करने से लाभ होता है। हाथ पैरों में होनेवाले दाह अथवा शाखागत दाह रोग में रजतभस्म को मिश्री में मिलाकर सेवन करना चाहिये । रजतभस्म को मिश्री, घृत तथा इलायचीचूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र ही भयंकर उदररोग में आराम आता है। त्रिजातक (दालचीनी, तेजपत्र, छोटी इलायची) चूर्ण के साथ रजतभस्म का प्रयोग करने से प्रमेह आदि रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ।