रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्लक्ष्णखल्वेऽथ सम्पेष्य काचकूप्यां तु विन्यसेत्। अमृतीकरणादेवं ताम्रं स्यादमृतोपमम् ॥ ३६॥ तत्रागमाद्योऽमृतीकरणप्रकारः—सुमृतं ताम्रचूर्णंन्तु इत्यादिना निर्दिष्टः निग- दव्याख्यातः। यद्यपि प्राचीनतन्त्रेषु गन्धकसहितं नामृतीकरणमुक्तं, अपितु केवलं पञ्चामृतसूरणद्रवैरेव; तथापि गन्धकस्यापि सह लेपाद् बहुलगुणं भवति। गन्धकस्य सूक्ष्माज्वलनेन ताम्राणुवंशपर्यन्तमपि पञ्चामृतादिगुणाधावनात्, इत्य- मिसन्धायामृतीकरणप्रकारोऽयमनुभूत उद्भावित आचार्यैः। शार्ङ्गधरसंहिताया- मपि अर्धगन्धकलेपद्वारा अमृतीकरणमुक्तमित्यवधेयम् ॥ ३७-३६ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह से भस्म किया हुआ ताम्र एक भाग और शुद्ध गन्धक आधा भाग लेकर दोनों को एकत्र पञ्चामृत के साथ अच्छी तरह पीसकर इसकी टिकिया बना लें। इन टिकियाओं को सुखाकर एक शरावसम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूक दें। इस विधि को तीन बार दुहराने से ताम्र उक्त अष्ट- दोष रहित हो जाता है। इसको अच्छे खलों में खूब अच्छी तरह बारीक पीस कर कांच की शीशी में रख लेना चाहिये। इस अमृतीकरण क्रिया द्वारा ताम्र- भस्म अमृतसदृश गुणकारी हो जाती है ॥ ३७-३६ ॥ वक्तव्य—पुरातन रसग्रन्थों में गन्धक सहयोग में अमृतीकरण करना नहीं माना गया, किन्तु केवल पञ्चामृत के साथ पुट देना अथवा सूरणकन्द में बन्द कर पुट देना ही अमृतीकरण माना है। परन्तु गन्धकयोग से अमृतीकरण करने पर हानि के स्थान पर गुण ही होते हैं। क्योंकि यदि किसी सूक्ष्मातिसूक्ष्मांश में ताम्रभस्म दोषयुक्त हो तो उसके लिये भी गन्धक अत्युपयोगी है। अन्यथा गन्धक ताम्र का मारक होने से अपने द्वारा पञ्चामृत गुणों को ताम्र के अणुओं तक पहुँचाने से उसमें गुणों की विशेषता कर देता है। अतः गन्धकयुक्त पञ्चा- मृत से अमृतीकरण उत्तम समझनी चाहिये। द्वितीयोऽमृतीकरणप्रकारः सम्यङ्मृतं सूर्यसखस्य चूर्णं तदर्धसंशोधितगन्धकञ्च। दत्त्वा ततोऽम्लैः खलु निम्बुकोत्थैः सम्पेइयेद् याममलं रसज्ञः ॥४०॥ गोलं विधायाऽथ रविप्रियस्य ह्युपर्युधःसूरणकन्दसंस्थम्। मृत्कर्पटैश्चाथ विलिप्य गोलं पुटे गजाख्ये पुटयेद्विभिज्ञः॥४१॥ रसागमज्ञैरनया तु रीत्याऽमृतक्रियायां खलु पाचतन्नु। वान्त्यादिकं न प्रकरोति नूनं ताम्रं निकामं त्वमृतोपमं स्यात् ॥४२॥