रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें२७ सप्तदशस्तरङ्गः ४१७ भा.टी.—ताम्र की भस्म हो जाने पर भी यदि उसका अमृतीकरण संस्कार किये बिना ही सेवन किया जाय तो उससे विष के सदृश कष्टदायक आठ दोषों या विकारों की उत्पत्ति होती है। अतः ताम्रभस्म में पाये जानेवाले आठ दोषों को दूर करने के लिये वैद्य को अच्छी तरह अमृतीकरण करना चाहिये ॥३४,३५॥ दोषाष्टकनिरूपणम् वान्तिर्भ्रान्तिश्चित्तसन्तापशोषौ गाढं क्लेदश्चारुचिर्दाहमोहौ । इत्यष्टौ वै सूर्यलोहस्य दोषाः पूर्वाचार्यैः क्लेशदाः सम्प्रदिष्टाः ॥ ३६ ॥ दोषाष्टकं ताम्रे वर्त्तमानं स्वभावतो वान्तिभ्रान्तिप्रभृति, तत्र प्राचीनैरपि स्फुटमुक्तमेवेत्याह पूर्वाचार्यैरिति । उक्तं हि—“ताम्रे त्वष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः” इति ॥ ३६ ॥ भा.टी.—ताम्र में विभिन्न प्रकार के खनिजयोगों तथा तुत्थ के सहयोग से—वमन लाना, चक्कर आना, मन में क्षोभ, मुखशोष, या धातुक्षोभ, अत्यन्त तीव्रता, जी मचलाना, भोजन में अरुचि होना, सब शरीर में दाह होना और मूर्च्छा होना, ये आठ अत्यन्त दुःखदायी दोष होते हैं। इन्हीं को शान्त करने के लिये अमृतीकरण किया जाता है ॥ ३६ ॥ वक्तव्य—अमृतीकरण के लिये किस अवस्था की भस्म लेनी चाहिये इस पर वैद्यों का द्विविध विचार पाया जाता है। कुछ लोगों का यह विचार है कि अमृतीकरण के लिये ताम्रभस्म रेखापूर्ण वारितर लक्षणवाली होनी चाहिये । और कुछ कहते हैं कि रेखापूर्णता और वारितरता के अतिरिक्त उसमें तूतिये का भाग भी नहीं रहना चाहिये । इसके लिये वे लोग ताम्रभस्म को एक पत्ते या कांसे के पात्र में पड़े हुए दही के ऊपर डालकर कम से कम चौबीस घंटे प्रतीक्षा करते हैं। यदि इस अवधि में ताम्रभस्मवाले स्थान पर दही नीला या हरा-सा हो जाय तो उसे फिर पुट देकर अमृतीकरण के उपयोगी समझते हैं। हमारी समझ में यह विधि ही ताम्र प्रयोग में अच्छी है। प्रथमोऽमृतीकरणप्रकारः सुमृतं ताम्रचूर्णन्तु तदर्धं गन्धकं तथा । पञ्चामृतेन सम्पेष्य विधानज्ञा भिषग्वरः ॥ ३७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य ताम्रं विहितचक्रिकम् । त्रिबारं पुटयेदेवं रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ३८ ॥