रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ रस्तरङ्गिणी सूचीसुवेध्यं खलु ताम्रपत्रं तुल्यांशगन्धेशजकज्जलञ्च । समं समादाय भिषग्वरेण्यः सम्पेपयेद्वै स्वरसैः कुमार्याः ॥३२॥ विशोष्य घर्मेऽथ शरावसंस्थं पुटेद्विधिज्ञो लवणाख्ययन्त्रे । इत्थं दिनार्द्धं परिपाचने नह्यनुत्तमां याति मृतिन्त ताम्रम् ॥३३॥ षष्ठः प्रकारः—कज्जलीलेपसाध्यो लवणयन्त्रपाकी प्राचीनतन्त्रसम्मतश्चेति । उक्तं हि—“ताम्रपादांशतः सूतं ताम्रतुल्यञ्च गन्धकम् । मर्दयेद् यामयुग्मं च यावत्कज्जलिका भवेत् ॥ तां तु कन्यारसैः पिष्ट्वा ताम्रपत्राणि लेपयेत् । संशु- ष्काणि ततस्तानि शेष कज्जलिकान्तरम् ॥ निक्षिप्य हण्डिकामध्ये शरावेण निरो- धयेत् । संधिरन्ध्रं द्वयोः कुर्यादम्बुभस्मविलेपनम् ॥ हण्डिकां पटुनाऽऽपूर्य भस्मना वा गलावधि । पिधाय चुल्ल्यामारोप्य वह्निं प्रज्वालयेद् दृढम् । चतुर्यामं ततः स्वाङ्गशीतलं तत्समुद्धरेत् ॥” इति ॥३२-३३॥ भा.टी.—सूचीवेध्य शुद्ध ताम्रपत्र, शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक तीनों को समभाग में लेकर एक खरल में डालें, फिर इसमें घीकुआर स्वरस मिलाकर खूब मर्दन करें । जब पारद गन्धक की कज्जली इसमें अच्छी तरह मिल जाय तो इसे धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके लवणयन्त्र के बीच में रखकर बारह घण्टे की अग्नि देकर पकायें । इस प्रकार ताम्र की भस्म हो जाती है॥३२-३३॥ वक्तव्य—एक बार ही लवणयन्त्र में पकाने से ताम्र की ठीक भस्म होनी कठिन है, अतः लवणयन्त्र में पकाने के बाद इसको पारदगन्धक के साथ दो तीन पुट भी देनी चाहिए । उक्त विधियों में से किसी एक विधि से बनाई हुई ताम्रभस्म को थोड़ी मात्रा में लेकर थोड़े से दही में एक काँच की शीशी या प्याली में १३ घण्टे तक पड़े रहने दें । यदि दही में नीलापन दीखे तो ताम्र- भस्म ठीक नहीं समझनी चाहिये । ऐसी भस्म को पुनः सूरणकंद के स्वरस में घोट कर ठीक भस्म होने तक पुनः गजपुट देनी चाहिये । ताम्रभस्म को सूर्य की किरणों द्वारा देखने पर यदि वह निश्चन्द्र दिखाई दे तो उसे शुद्ध भस्म समझना चाहिये : अमृतकरणस्य प्रयोजनम् मृतमप्यरविन्दन्तु ह्यमृतकिरणोज्झितम् । सेवितं दर्शयत्यष्टौ दोषानाशु विषोपमान् ॥ ३४ ॥ तस्मान्मृतस्य ताम्रस्य दोषाष्टकनिवृत्तये । अमृतीकरणं यत्नाद् विदध्याद्भिषगग्रणीः ॥ ३५ ॥