भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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सप्तदशस्तरङ्गः ४१५

इत्थं त्रिवारं पुटयेत्तुल्यं गन्धं विनिक्षिपेन् । एवं मृतं ताम्रकं स्यादञ्जनादौ गुणावहम् ॥२६॥ चतुर्थो मारणप्रकारः केवलगन्धसाधितो वालुकायन्त्रपाकानन्तरं त्रिधा पुटि- तोऽञ्जनाद्युपयोगी ॥२६-२६॥ भा.टी.—शुद्धताम्रपत्र दस पल परिमाण और शुद्ध गन्धक बीस पल परि- माण लेकर दोनों को एकत्र खरल में खूब मर्दन करके सम्पुट में बन्द कर सम्पुट की सन्धि को अच्छी तरह कपड़मिट्टी से पोतकर सुखा लें। अब इस संपुट को वालुकायन्त्र के बीच में रखकर चौबीस घण्टे की अग्नि में पकायें। जब यन्त्र स्वांगशीत हो जाय तो यन्त्र में से ताम्र को निकाल फिर उसमें समभाग शुद्ध गन्धक मिला अच्छी तरह खरल में पीसकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें। इस प्रकार तीन बार पुट में फूँकने से ताम्र की भस्म हो जाती है। इस भस्म को अञ्जन आदि बाह्य प्रयोग में काम लाना चाहिये ॥२६-२६॥ पञ्चमो मारणप्रकारः नेपालशुल्बस्य दलानि शुद्धान्यादाय पूर्वं भिषजां वरेण्यः । तुल्यांशगन्धेशजकज्जलंश्च पदांशिकीं रोगशिलाञ्च शुद्धाम् ॥३०॥ दत्त्वा तदर्धं हरितालकञ्च कन्याद्रवेणैव विमर्द्य वैद्यः । विशोष्य घर्मे पुटयेद्विधिज्ञः प्रयाति ताम्रं मृतिमाश्वपूर्वाम् ॥३१॥ पञ्चमः प्रकारः—पारदगन्धकहरितालशिलाभिः साधनीयः सत्वरसिद्धिश्चेति । तुल्यांशौ समानभागिकौ यौ गन्धेशौ गन्धकपारदौ ताभ्यां जातं निष्पादितमिति यावत् ,यत्कज्जलं कज्जलिका तदित्यर्थः । तच्चानुक्तमानत्वेन ताम्रपत्रसम ग्राह्यम् ॥३०, ३१॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, शुद्ध पारद एक भाग, शुद्ध गन्धक एक भाग, शुद्ध मैनसिल चौथाई भाग और शुद्ध हरताल आठवाँ भाग लेकर पहिले पारद गन्धक की एकत्र कज्जली कर लें। अब इससे ताम्रचूर्ण मिलाकर कुछ देर घोटें, बाद को मैनसिल और हरतालचूर्ण मिला घीकुआर के रस में खूब मर्दन करके धूप में सुखा लें । अब इस धूप में सूखे हुए चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक दें। इस प्रकार तब तक उक्त द्रव्यों के साथ ताम्रचूर्ण को पुट दें जब तक उसकी ठीक भस्म न हो जाय। इस विधि से ताम्रभस्म शीघ्र हो जाती है ॥२०, २१॥

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