भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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  • ४१४ रसतरङ्गिणी

विशोष्य घर्मे खलुसम्पुटस्थं पुटेत् त्रिवारं भिषगप्रमत्तः । इत्थं मृत ताम्रकमामयज्ञः प्रयोजयेत्खल्वमृतक्रियायै ॥२४॥ ताम्रापेक्षया चतुर्थांशेन शुद्धसूतेन ताम्रदलानां प्राङ्मर्दनं ततश्चाङ्गेरीरसपिष्ट- गन्धकेन पेषणम्, ततः संशोष्य पुटनम्, एवं त्रिधा। ततोऽमृतीकरणयोग्यतेति॥२४॥ भा.टी.-विशुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, शुद्धपारद चौथाई भाग हे, शुद्धगन्धक एक भाग लेकर पहिले ताम्रचूर्ण का पारद के साथ मर्दन करें। पश्चात् गन्धकके साथ चांगेरीस्वरस में खूब मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस पारद गन्धक के साथ मर्दित शुष्कताम्रचूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुटमें फूँक दें। इस प्रकार तीन बार पारद गन्धकयोग से ताम्र को तीन गजपुट देने से उसकी भस्म हो जाती है। इसको अमृतीकरण करके काम में लाना चाहिये ॥२३, २४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विशुद्धशुल्वस्य दलानि निम्बूद्रवप्रपिष्टेश्वरगन्धलेपात् । विशोष्य घर्मे पुटितानि नूनं वारत्रयेणेह मृतिं प्रयान्ति ॥२५॥ तृतीय प्रकारो निम्बूद्रवपेषितया समपारदगन्धककृतकज्जल्या त्रिधा पुटि- तोऽञ्जनाद्युपयोगी ॥२५॥ भा.टी.- शुद्ध ताम्रपत्र एक भाग, शुद्ध पारद एक भाग, शुद्ध गन्धक एक भाग, इन्हें लेकर पहिले पारद और गन्धक की कज्जली बना लें, फिर इस कज्जली को नीबू के रस में घोंटकर इसका ताम्रपत्रों पर लेप करके धूप में सुखा इन कज्जलांलिप्त ताम्रपत्रों को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक दें। इस विधि को तीन बार दुहराने से ताम्र की भस्म हो जाती है ॥२५॥ वक्तव्य--उक्त विधियों से तीन गजपुट देने से सम्भव है कि ताम्र का उत्तम भस्म हो सके, अतः तीन पुट के स्थान पर पाँच-सात पुट देने चाहिये अथवा ठीक भस्म होने तक पुट देने चाहिये । चतुर्थो मारणप्रकारः ताम्रं पत्रीकृतं शुद्धं भिषग् दशपलोन्मितम् । ताम्रद्विगुणितञ्चैव गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥२६॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा मृदा सन्धि निरोधयेत् । अहोरात्रं पचेद्यत्नाद् वालुकायन्त्रगं भिषक् ०।२७॥ स्वाङ्गशीतन्तु विज्ञाय सम्पुटं त्ववतारयेत् । ताम्रोन्मित बलिं दत्त्वा शुल्वं खल्वेऽथ पेषयेत् ॥२८॥

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