भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 439

सप्तदशस्तरङ्गः ४१३ क्वाथे कुलत्थप्रभवे च ताम्रं प्रयाति शुद्धिं खलु निर्विशेषाम् ॥१८॥ भा. टी.—ताम्र के पत्रों पर त्रिचार, पञ्चवार अथवा अष्टवारों को काञ्जी निम्बूरस आदि किसी अम्लद्रव से पीसकर इसका लेप करके अग्नि में तपायें और तक्र में बुझा दें । इस प्रकार सात बार तक्र ( माठा ) और सात बार कुलत्यक्वाथ में बुझाने से ताम्र शुद्ध हो जाता है ॥१८॥ ताम्रस्य प्रथमो मारणप्रकारः तुल्यांशसंशोधितहिंगुलेन सलुङ्गनीरेण रखेर्द्लानाम् । पिष्टिं विधायाथ विशोष्य घर्मं सुश्लक्ष्णचूर्णीश्च ततो विदध्यात् ॥१९॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रे च विधानज्ञस्ततः पचेत् । निर्विशेषविशुद्धञ्च रसराजं समाहरेत् ॥२०॥ एवं वारत्रयं कुर्याद्वारद्वयमथापि वा । रविचूर्णसमञ्चाथ गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥२१॥ त्रिबारं पुटयेदेवं वारद्वयमथापि वा । इत्थं मृतं ताम्रकं स्यादमृतीकरणोचितम् ॥२२॥ अथ मारणप्रकारः प्रथमः—द्विवारं त्रिवारं वेति भस्मयोग्यतापेक्षया ज्ञेयम् । अमृतीकरणोचितं न तु भक्षणयोग्यम्, अमृतीकरणमनुपदं वक्ष्यते ॥१९–२२॥ भा. टी.—उक्त प्रकार से शुद्ध ताम्र का चूर्ण एक भाग और शुद्ध हिंगुल एक भाग लेकर इन दोनों को बिजौरानींबू के स्वरस से खूब मर्दन कर पिष्ठी सी बना लें । इस पिष्ठी को धूप में सुखाकर इसका चूर्ण बना लें । इस चूर्ण को ऊर्ध्वपातन की हाँडी में डालकर दूसरी हाँडी से बन्द कर लेप कर दें और यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ा दें । चूल्हे में अग्नि जलाकर पकायेंतो उपर की हाँडी में हिंगुलोत्थ पारद और नीचे के पात्र में ताम्रचूर्ण प्राप्त होगा । पुनः उक्त प्रकार से समभाग हिंगुल के साथ ऊर्ध्वपातन करें । इस प्रकार तीन बार ऊर्ध्व- पातन से प्राप्त ताम्रचूर्ण में समभाग शुद्ध गन्धक पीसकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूंक दें । इस तरह गन्धक के साथ दो या तीन पुट देने से ताम्र की भस्म अमृतीकरण के योग्य बन जाती है । इसको अमृतीकरण किये बिना अंतःप्रयोग में नहीं लाना चाहिये ॥१९–२२॥ द्वितीयो मारणप्रकारः पादांशसंशोधितपारदेन सुसूक्ष्मपत्राणि रवेर्विमद्य । चाङ्गेरिकापत्ररसप्रपिष्टतुल्यांशगन्धेन च पेषयेद्वै ॥२१॥