भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४१२ रसतरङ्गिणी पुष्पः शीतसहो निर्गुण्डी नीलसिन्दूरका" इति धन्वन्तरिः । अतिवेलं अत्यर्थम्॥१३॥ भा. टी.—ताम्र के बहुत सूक्ष्म पत्रों को एक पतेली में डालकर उसमें नील पुष्प की सम्भालु के पत्रों का स्वरस डालकर भर दें । अब इस पतेली या हाँडी को चूल्हे पर चढ़ाकर एक दिनतक पकायें तो ताम्र उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥१३॥ तृतीयः शोधनप्रकारः नेपालशुलबस्य दलानि सूक्ष्माण्यादाय सिन्धूत्थसमन्वितानि । संस्वेदयेन्मन्दिरवारिपूरे त नुत्तमां शुद्धमिहोपयाति ॥१४॥ भा.टी.—नेपालजातीय ताम्र के सूक्ष्म पत्र बनाकर उनको एक हाँडी में डाल- कर उसमें ताम्रसमभाग सैन्धानमक और प्रचुर मात्रा में काञ्जी भरदें और चूल्हे पर चढ़ाकर एक दिनतक पकाकर गरम जलसे धो लेनेपर ताम्र शुद्ध हो जाता है॥१४॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः सिन्धूत्थवज्र्यर्कपयःप्रलिप्तान्यादाय पत्राणि रविप्रियस्य । प्रताम्य वहावथ सिन्दुवारद्रवे निषिञ्चेत् खलु सप्तवारम् ॥१५॥ अनेन तु विधानेन विशुद्धं लोहितायसम् मारणाय प्रयुञ्जीत वीतशङ्को भिषग्वरः ॥१६॥ भा. टी.—नेपालजातीय ताम्र के सूक्ष्म कण्टकवेधी पत्र बनाकर उनके ऊपर आक तथा थोहर के दूध में पिसे हुए सैन्धानमक कल्क का लेप करके अग्नि में तपायें, जब ताम्रपत्र लाल हो जायें तो इन्हें चिमटे से पकड़कर सम्भा- लूपत्र (सिन्दुवार) स्वरस में बुझायें । इस प्रकार सात बार सैन्धानमक कल्क का लेप कर अग्नि में तपा सम्भालूस्वरस से बुझाने से ताम्र शुद्ध हो जाता है। इसको भस्म करने के लिये निःसंकोच काम में लाना चाहिये ॥१५, १६॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः वस्वंशसिन्धूत्थसमन्वितानि नेपालशुलबस्य दलानि कामम् । गोमूत्रयुक्तानि पचेद् द्वियामं रविप्रियं शुद्धयति नात्र शङ्का ॥१७॥ भा. टी.—नेपालताम्रपत्र एक भाग और सैन्धानमक आठवाँ भाग लेकर एक हाँडी में डालें । अब इस पात्र में गोमूत्र भरकर इसको चूल्हे पर रख, दो पहर तक अग्नि पर पकावें तो ताम्र निःसन्देह शुद्ध हो जाता है ॥१७॥ षष्ठः शोधनप्रकारः क्षाराम्ललिप्तानि तु ताम्रपत्राण्यग्नौ प्रताम्य स्नपयेत्तु तक्रे ।