भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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जाती है और सेवन करते ही थोड़ी देर में जी मिचलाने लगता है, उलटी होने लगती है, शिर में चक्कर आने लगते हैं और रोगी बेचैन हो जाता है। इसी तरह अशुद्धताम्र सेवन से शरीर में ताप की वृद्धि हो जगती है और सब शरीर की धातुओं का पोषण बन्द होकर सूखने लगता है, अतीसार होने लगता है और रोगी को बार-बार मूर्च्छा आने लगती है। अतः बिना शुद्ध किये हुए ताम्र का सेवन नहीं करना चाहिये ॥१०, ११॥ वक्तव्य—उक्त दोषों के कारक ताम्र को ग्रन्थान्तर में एक भयंकर दुःख- दायी विष माना गया है—"न विषं विषममित्याहुस्ताम्रं तु विषमुच्यते"। इसमें रक्त विकृतिकारक दोष होने से सारे शरीर में फोड़ा-फुन्सी आदि निकल आते हैं। ताम्रगत क्षोभक एवं उत्तेजक विष के कारण शरीर में गर्मी बहुत ही बढ़ जाती है। आमाशय में क्षोभ उत्पन्न होने से इसके द्वारा तीव्र वमन होने लगती है। सारांश यह है कि अशुद्ध ताम्र में तूतिये का भाग बहुत अधिक तीव्र रूप से होता है। अतः उसको ताम्र से पृथक् किये बिना या लघु किये बिना ताम्र अंतःप्रयोग के उपयोगो नहीं हो सकता है। इसके द्वारा उत्पन्न होनेवाले आठ दोषों का वर्णन आगे किया जायगा। ताम्रस्य प्रथमः शोधनप्रकारः पत्रीकृतन्तु तरणिं ज्वलने प्रतप्तं चाङ्गेरिकादलरसे स्नपयेद्विधिक्षः । इत्थं विशोधितमलं खलु सूर्यलोहं संयोजयेन्मृतिविधौ भिषजां वरेण्यः ॥१२॥ प्रथमः शोधनप्रकारः—तरणिं ताम्रम्, चाङ्गेरिकादलरसे शोधनम् “ताम्र- मम्लेन शुद्ध्यतीति” प्राचीनसंवादात् ॥१२॥ भा. टी.—ताम्र शोधन करने के लिये पहिले इसके बहुत पतले-पतले पत्र बना लें। अब पत्रों को तीव्र अग्नि में खूब तपाकर चांगेरीपत्रस्वरस में बुझायें। इस प्रकार इक्कीस बार गरम करके चांगेरीस्वरस में बुझाने से ताम्र शुद्ध हो जाता है। इसे भस्म बनाने के काम में लाना चाहिये ॥१२॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः रविलोहदलं पिठरीनिहितं खलु शीतसहस्वरसे तु दिनम् । परिपाचितमत्यचिरान्नियतं विमलत्वमुपैत्यनिवेर्लामदम् ॥१३॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—पिठरी स्थालिका, शीतसहो नीलसिन्दुवारः- “नील-