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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ
  • ४१४ रसतरङ्गिणी

विशोष्य घर्मे खलुसम्पुटस्थं पुटेत् त्रिवारं भिषगप्रमत्तः । इत्थं मृत ताम्रकमामयज्ञः प्रयोजयेत्खल्वमृतक्रियायै ॥२४॥ ताम्रापेक्षया चतुर्थांशेन शुद्धसूतेन ताम्रदलानां प्राङ्मर्दनं ततश्चाङ्गेरीरसपिष्ट- गन्धकेन पेषणम्, ततः संशोष्य पुटनम्, एवं त्रिधा। ततोऽमृतीकरणयोग्यतेति॥२४॥ भा.टी.-विशुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, शुद्धपारद चौथाई भाग हे, शुद्धगन्धक एक भाग लेकर पहिले ताम्रचूर्ण का पारद के साथ मर्दन करें। पश्चात् गन्धकके साथ चांगेरीस्वरस में खूब मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस पारद गन्धक के साथ मर्दित शुष्कताम्रचूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुटमें फूँक दें। इस प्रकार तीन बार पारद गन्धकयोग से ताम्र को तीन गजपुट देने से उसकी भस्म हो जाती है। इसको अमृतीकरण करके काम में लाना चाहिये ॥२३, २४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विशुद्धशुल्वस्य दलानि निम्बूद्रवप्रपिष्टेश्वरगन्धलेपात् । विशोष्य घर्मे पुटितानि नूनं वारत्रयेणेह मृतिं प्रयान्ति ॥२५॥ तृतीय प्रकारो निम्बूद्रवपेषितया समपारदगन्धककृतकज्जल्या त्रिधा पुटि- तोऽञ्जनाद्युपयोगी ॥२५॥ भा.टी.- शुद्ध ताम्रपत्र एक भाग, शुद्ध पारद एक भाग, शुद्ध गन्धक एक भाग, इन्हें लेकर पहिले पारद और गन्धक की कज्जली बना लें, फिर इस कज्जली को नीबू के रस में घोंटकर इसका ताम्रपत्रों पर लेप करके धूप में सुखा इन कज्जलांलिप्त ताम्रपत्रों को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक दें। इस विधि को तीन बार दुहराने से ताम्र की भस्म हो जाती है ॥२५॥ वक्तव्य--उक्त विधियों से तीन गजपुट देने से सम्भव है कि ताम्र का उत्तम भस्म हो सके, अतः तीन पुट के स्थान पर पाँच-सात पुट देने चाहिये अथवा ठीक भस्म होने तक पुट देने चाहिये । चतुर्थो मारणप्रकारः ताम्रं पत्रीकृतं शुद्धं भिषग् दशपलोन्मितम् । ताम्रद्विगुणितञ्चैव गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥२६॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा मृदा सन्धि निरोधयेत् । अहोरात्रं पचेद्यत्नाद् वालुकायन्त्रगं भिषक् ०।२७॥ स्वाङ्गशीतन्तु विज्ञाय सम्पुटं त्ववतारयेत् । ताम्रोन्मित बलिं दत्त्वा शुल्वं खल्वेऽथ पेषयेत् ॥२८॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४१५

इत्थं त्रिवारं पुटयेत्तुल्यं गन्धं विनिक्षिपेन् । एवं मृतं ताम्रकं स्यादञ्जनादौ गुणावहम् ॥२६॥ चतुर्थो मारणप्रकारः केवलगन्धसाधितो वालुकायन्त्रपाकानन्तरं त्रिधा पुटि- तोऽञ्जनाद्युपयोगी ॥२६-२६॥ भा.टी.—शुद्धताम्रपत्र दस पल परिमाण और शुद्ध गन्धक बीस पल परि- माण लेकर दोनों को एकत्र खरल में खूब मर्दन करके सम्पुट में बन्द कर सम्पुट की सन्धि को अच्छी तरह कपड़मिट्टी से पोतकर सुखा लें। अब इस संपुट को वालुकायन्त्र के बीच में रखकर चौबीस घण्टे की अग्नि में पकायें। जब यन्त्र स्वांगशीत हो जाय तो यन्त्र में से ताम्र को निकाल फिर उसमें समभाग शुद्ध गन्धक मिला अच्छी तरह खरल में पीसकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें। इस प्रकार तीन बार पुट में फूँकने से ताम्र की भस्म हो जाती है। इस भस्म को अञ्जन आदि बाह्य प्रयोग में काम लाना चाहिये ॥२६-२६॥ पञ्चमो मारणप्रकारः नेपालशुल्बस्य दलानि शुद्धान्यादाय पूर्वं भिषजां वरेण्यः । तुल्यांशगन्धेशजकज्जलंश्च पदांशिकीं रोगशिलाञ्च शुद्धाम् ॥३०॥ दत्त्वा तदर्धं हरितालकञ्च कन्याद्रवेणैव विमर्द्य वैद्यः । विशोष्य घर्मे पुटयेद्विधिज्ञः प्रयाति ताम्रं मृतिमाश्वपूर्वाम् ॥३१॥ पञ्चमः प्रकारः—पारदगन्धकहरितालशिलाभिः साधनीयः सत्वरसिद्धिश्चेति । तुल्यांशौ समानभागिकौ यौ गन्धेशौ गन्धकपारदौ ताभ्यां जातं निष्पादितमिति यावत् ,यत्कज्जलं कज्जलिका तदित्यर्थः । तच्चानुक्तमानत्वेन ताम्रपत्रसम ग्राह्यम् ॥३०, ३१॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, शुद्ध पारद एक भाग, शुद्ध गन्धक एक भाग, शुद्ध मैनसिल चौथाई भाग और शुद्ध हरताल आठवाँ भाग लेकर पहिले पारद गन्धक की एकत्र कज्जली कर लें। अब इससे ताम्रचूर्ण मिलाकर कुछ देर घोटें, बाद को मैनसिल और हरतालचूर्ण मिला घीकुआर के रस में खूब मर्दन करके धूप में सुखा लें । अब इस धूप में सूखे हुए चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक दें। इस प्रकार तब तक उक्त द्रव्यों के साथ ताम्रचूर्ण को पुट दें जब तक उसकी ठीक भस्म न हो जाय। इस विधि से ताम्रभस्म शीघ्र हो जाती है ॥२०, २१॥

४१६ रस्तरङ्गिणी सूचीसुवेध्यं खलु ताम्रपत्रं तुल्यांशगन्धेशजकज्जलञ्च । समं समादाय भिषग्वरेण्यः सम्पेपयेद्वै स्वरसैः कुमार्याः ॥३२॥ विशोष्य घर्मेऽथ शरावसंस्थं पुटेद्विधिज्ञो लवणाख्ययन्त्रे । इत्थं दिनार्द्धं परिपाचने नह्यनुत्तमां याति मृतिन्त ताम्रम् ॥३३॥ षष्ठः प्रकारः—कज्जलीलेपसाध्यो लवणयन्त्रपाकी प्राचीनतन्त्रसम्मतश्चेति । उक्तं हि—“ताम्रपादांशतः सूतं ताम्रतुल्यञ्च गन्धकम् । मर्दयेद् यामयुग्मं च यावत्कज्जलिका भवेत् ॥ तां तु कन्यारसैः पिष्ट्वा ताम्रपत्राणि लेपयेत् । संशु- ष्काणि ततस्तानि शेष कज्जलिकान्तरम् ॥ निक्षिप्य हण्डिकामध्ये शरावेण निरो- धयेत् । संधिरन्ध्रं द्वयोः कुर्यादम्बुभस्मविलेपनम् ॥ हण्डिकां पटुनाऽऽपूर्य भस्मना वा गलावधि । पिधाय चुल्ल्यामारोप्य वह्निं प्रज्वालयेद् दृढम् । चतुर्यामं ततः स्वाङ्गशीतलं तत्समुद्धरेत् ॥” इति ॥३२-३३॥ भा.टी.—सूचीवेध्य शुद्ध ताम्रपत्र, शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक तीनों को समभाग में लेकर एक खरल में डालें, फिर इसमें घीकुआर स्वरस मिलाकर खूब मर्दन करें । जब पारद गन्धक की कज्जली इसमें अच्छी तरह मिल जाय तो इसे धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके लवणयन्त्र के बीच में रखकर बारह घण्टे की अग्नि देकर पकायें । इस प्रकार ताम्र की भस्म हो जाती है॥३२-३३॥ वक्तव्य—एक बार ही लवणयन्त्र में पकाने से ताम्र की ठीक भस्म होनी कठिन है, अतः लवणयन्त्र में पकाने के बाद इसको पारदगन्धक के साथ दो तीन पुट भी देनी चाहिए । उक्त विधियों में से किसी एक विधि से बनाई हुई ताम्रभस्म को थोड़ी मात्रा में लेकर थोड़े से दही में एक काँच की शीशी या प्याली में १३ घण्टे तक पड़े रहने दें । यदि दही में नीलापन दीखे तो ताम्र- भस्म ठीक नहीं समझनी चाहिये । ऐसी भस्म को पुनः सूरणकंद के स्वरस में घोट कर ठीक भस्म होने तक पुनः गजपुट देनी चाहिये । ताम्रभस्म को सूर्य की किरणों द्वारा देखने पर यदि वह निश्चन्द्र दिखाई दे तो उसे शुद्ध भस्म समझना चाहिये : अमृतकरणस्य प्रयोजनम् मृतमप्यरविन्दन्तु ह्यमृतकिरणोज्झितम् । सेवितं दर्शयत्यष्टौ दोषानाशु विषोपमान् ॥ ३४ ॥ तस्मान्मृतस्य ताम्रस्य दोषाष्टकनिवृत्तये । अमृतीकरणं यत्नाद् विदध्याद्भिषगग्रणीः ॥ ३५ ॥

२७ सप्तदशस्तरङ्गः ४१७ भा.टी.—ताम्र की भस्म हो जाने पर भी यदि उसका अमृतीकरण संस्कार किये बिना ही सेवन किया जाय तो उससे विष के सदृश कष्टदायक आठ दोषों या विकारों की उत्पत्ति होती है। अतः ताम्रभस्म में पाये जानेवाले आठ दोषों को दूर करने के लिये वैद्य को अच्छी तरह अमृतीकरण करना चाहिये ॥३४,३५॥ दोषाष्टकनिरूपणम् वान्तिर्भ्रान्तिश्चित्तसन्तापशोषौ गाढं क्लेदश्चारुचिर्दाहमोहौ । इत्यष्टौ वै सूर्यलोहस्य दोषाः पूर्वाचार्यैः क्लेशदाः सम्प्रदिष्टाः ॥ ३६ ॥ दोषाष्टकं ताम्रे वर्त्तमानं स्वभावतो वान्तिभ्रान्तिप्रभृति, तत्र प्राचीनैरपि स्फुटमुक्तमेवेत्याह पूर्वाचार्यैरिति । उक्तं हि—“ताम्रे त्वष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः” इति ॥ ३६ ॥ भा.टी.—ताम्र में विभिन्न प्रकार के खनिजयोगों तथा तुत्थ के सहयोग से—वमन लाना, चक्कर आना, मन में क्षोभ, मुखशोष, या धातुक्षोभ, अत्यन्त तीव्रता, जी मचलाना, भोजन में अरुचि होना, सब शरीर में दाह होना और मूर्च्छा होना, ये आठ अत्यन्त दुःखदायी दोष होते हैं। इन्हीं को शान्त करने के लिये अमृतीकरण किया जाता है ॥ ३६ ॥ वक्तव्य—अमृतीकरण के लिये किस अवस्था की भस्म लेनी चाहिये इस पर वैद्यों का द्विविध विचार पाया जाता है। कुछ लोगों का यह विचार है कि अमृतीकरण के लिये ताम्रभस्म रेखापूर्ण वारितर लक्षणवाली होनी चाहिये । और कुछ कहते हैं कि रेखापूर्णता और वारितरता के अतिरिक्त उसमें तूतिये का भाग भी नहीं रहना चाहिये । इसके लिये वे लोग ताम्रभस्म को एक पत्ते या कांसे के पात्र में पड़े हुए दही के ऊपर डालकर कम से कम चौबीस घंटे प्रतीक्षा करते हैं। यदि इस अवधि में ताम्रभस्मवाले स्थान पर दही नीला या हरा-सा हो जाय तो उसे फिर पुट देकर अमृतीकरण के उपयोगी समझते हैं। हमारी समझ में यह विधि ही ताम्र प्रयोग में अच्छी है। प्रथमोऽमृतीकरणप्रकारः सुमृतं ताम्रचूर्णन्तु तदर्धं गन्धकं तथा । पञ्चामृतेन सम्पेष्य विधानज्ञा भिषग्वरः ॥ ३७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य ताम्रं विहितचक्रिकम् । त्रिबारं पुटयेदेवं रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ३८ ॥

श्लक्ष्णखल्वेऽथ सम्पेष्य काचकूप्यां तु विन्यसेत्। अमृतीकरणादेवं ताम्रं स्यादमृतोपमम् ॥ ३६॥ तत्रागमाद्योऽमृतीकरणप्रकारः—सुमृतं ताम्रचूर्णंन्तु इत्यादिना निर्दिष्टः निग- दव्याख्यातः। यद्यपि प्राचीनतन्त्रेषु गन्धकसहितं नामृतीकरणमुक्तं, अपितु केवलं पञ्चामृतसूरणद्रवैरेव; तथापि गन्धकस्यापि सह लेपाद् बहुलगुणं भवति। गन्धकस्य सूक्ष्माज्वलनेन ताम्राणुवंशपर्यन्तमपि पञ्चामृतादिगुणाधावनात्, इत्य- मिसन्धायामृतीकरणप्रकारोऽयमनुभूत उद्भावित आचार्यैः। शार्ङ्गधरसंहिताया- मपि अर्धगन्धकलेपद्वारा अमृतीकरणमुक्तमित्यवधेयम् ॥ ३७-३६ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह से भस्म किया हुआ ताम्र एक भाग और शुद्ध गन्धक आधा भाग लेकर दोनों को एकत्र पञ्चामृत के साथ अच्छी तरह पीसकर इसकी टिकिया बना लें। इन टिकियाओं को सुखाकर एक शरावसम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूक दें। इस विधि को तीन बार दुहराने से ताम्र उक्त अष्ट- दोष रहित हो जाता है। इसको अच्छे खलों में खूब अच्छी तरह बारीक पीस कर कांच की शीशी में रख लेना चाहिये। इस अमृतीकरण क्रिया द्वारा ताम्र- भस्म अमृतसदृश गुणकारी हो जाती है ॥ ३७-३६ ॥ वक्तव्य—पुरातन रसग्रन्थों में गन्धक सहयोग में अमृतीकरण करना नहीं माना गया, किन्तु केवल पञ्चामृत के साथ पुट देना अथवा सूरणकन्द में बन्द कर पुट देना ही अमृतीकरण माना है। परन्तु गन्धकयोग से अमृतीकरण करने पर हानि के स्थान पर गुण ही होते हैं। क्योंकि यदि किसी सूक्ष्मातिसूक्ष्मांश में ताम्रभस्म दोषयुक्त हो तो उसके लिये भी गन्धक अत्युपयोगी है। अन्यथा गन्धक ताम्र का मारक होने से अपने द्वारा पञ्चामृत गुणों को ताम्र के अणुओं तक पहुँचाने से उसमें गुणों की विशेषता कर देता है। अतः गन्धकयुक्त पञ्चा- मृत से अमृतीकरण उत्तम समझनी चाहिये। द्वितीयोऽमृतीकरणप्रकारः सम्यङ्मृतं सूर्यसखस्य चूर्णं तदर्धसंशोधितगन्धकञ्च। दत्त्वा ततोऽम्लैः खलु निम्बुकोत्थैः सम्पेइयेद् याममलं रसज्ञः ॥४०॥ गोलं विधायाऽथ रविप्रियस्य ह्युपर्युधःसूरणकन्दसंस्थम्। मृत्कर्पटैश्चाथ विलिप्य गोलं पुटे गजाख्ये पुटयेद्विभिज्ञः॥४१॥ रसागमज्ञैरनया तु रीत्याऽमृतक्रियायां खलु पाचतन्नु। वान्त्यादिकं न प्रकरोति नूनं ताम्रं निकामं त्वमृतोपमं स्यात् ॥४२॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४१६ द्वितीयोऽमृतीकरणप्रकारो निम्बूद्रवपेषणसूरणकन्दमध्यस्थापनसाध्यो गन्धक- सहभावी चेति ॥ ४०-४२ ॥ भा.टो.—अच्छी तरह बनायी हुई ताम्रभस्म एक भाग और शुद्ध गन्धक आधा भाग लेकर खरल में एकत्र करके नींबूरस से तीन घंटे अच्छी तरह घोटें। अब इसको गोला-सा बनाकर अच्छी तरह सुखा लें और जिमीकन्द के भीतर इस गोले को रखकर जिमीकन्द के बाहर अच्छी तरह कपड़मिट्टी करके गजपुट की अग्नि में फूँक देवें। स्वांगशीत होने पर सावधानी से जिमीकन्द के भीतर से ताम्रभस्म के गोलक को बाहर निकाल खरल में पीसकर रख लें। रसशास्त्रज्ञों ने इस विधि से अमृतीकरण क्रियायुक्त ताम्रभस्म को पूर्वोक्त वमनादि अष्टदोष रहित अमृतसदृश गुणकारी माना है ॥ ४०-४२ ॥ तृतीयोऽमृतीकरणप्रकारः सम्यङ्मृतं सूर्यसखस्य चूर्णं सम्पेषयेद्वै स्वरसे कुमार्याः । विशोष्य घर्मेऽथ शरावसंस्थं पचेद् वराहाख्यपुटेऽश्ववारम् ॥४३॥ रीत्यानया वै ह्यमृतीकृतन्तु रविप्रियं शीलितमप्यमन्दम् । दोषाष्टकं नैव करोति नूनं ताम्रं निकामं त्वमृतोपमं स्यात् ॥ ४४ ॥ तृतीयः प्रकारः—सूर्यसखस्य ताम्रस्य । अयं हि केवलकुमारीरससाध्यः । अत्रानुक्तोऽपि गन्धकः क्षेप्यः । अश्ववारं सप्तवारमत्र पुटनम् ॥ ४३, ४४ ॥ भा.टी.—विधिपूर्वक भस्म किये हुये ताम्रचूर्ण को खरल में डालकर कुमारीस्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस शुष्क- चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके वराहपुट दें। इस विधि से सात बार दुहराने से ताम्रभस्म अष्टदोष रहित हो जाती है। इसके सेवन से अष्टद सम्बन्धी किसी प्रकार की थोड़ी भी शंका नहीं रहती है ॥ ४३, ४४ ॥ मृतताम्रस्य गुणाः ताम्रं तिक्तं तुवरमधुरं पाकतश्चोष्णवीर्यं त्वम्लं स्निग्धं खलु विषहरं सारकं लेखनञ्च । पित्तोद्भूतानपि च कफजान् श्लेष्मपित्तोत्थितान् वा घोरान् रोगानपि हि विरजानप्यशेषांश्च हन्यात् ॥ ४५ ॥ अथ मृतताम्रगुणाः- पाकतश्चोष्णवीर्यमिति प्राचीनतन्त्रेषु तु “ताम्रं कषायं मधुरञ्च तिक्तमम्लञ्च पाके कटु सारकञ्च । पित्तापहं श्लेष्महरञ्च शीतं" इत्युक्तम् तत्र शीतत्वं लघीयस्यां मात्रायां प्रयोगात् अथवा स्पर्शतौ ज्ञेयम् ॥ ४५ ॥

४२० रसतरङ्गिणी भा.टी.—ताम्रभस्म रस में तिक्त (कड़वी) तुवर (कषाय) तथा मधुर, पाक में कटु, वीर्य में उष्ण, आम्लरस, स्निग्धगुण, विषनाशक, पित्तनिःसारक, लेखक (वामक या शोथहर) होती है। इसके प्रयोग से पित्तप्रकोपजन्य, कफ- प्रकोपजन्य अथवा कफपित्तप्रकोपजन्य सभी प्रकार के पुरातन रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ वक्तव्य—उक्तगुण ताम्रभस्म के भौतिक गुण समझने चाहिये। प्रचीन रस ग्रन्थों में ये ताम्रभस्म गुण पाये जाते हैं, परन्तु किसी-किसी ने इसको शीतल भी माना है। वहाँ पर यह अत्यन्त मात्रा में अथवा स्पर्श में शीतल समझना चाहिये। अपि च ताम्रं दीपनमुत्तमं कृमिहरं कुष्ठामयध्वंसनं कासश्वासविधूननं क्षयहरं पाण्ड्वामयघ्नं परम्। दुर्नामग्रहणीगदप्रशमनं नेत्रामयेषूत्तमं स्थौल्यध्वंसकरं त्वलं बहुगिरा नानामयध्वंसनम् ॥ ४६ ॥ ताम्रं मृतं ज्वरहरं व्रणरोपणञ्च रुच्यं परं गदहरं ह्युदरामयघ्नम्। आयुष्यमप्युभयतः परिशोधनञ्च वैद्यैर्मतं खलु रसायनतन्त्रविद्भिः ॥४७॥ ताम्रं उत्तमं दीपनम् इति समन्वयः। दुर्नामानि अर्शांसि ॥ ४६, ४७ ॥ भा.टी.—ताम्रभस्म, उत्तमदीपक, उदरकृमिनाशक, रक्तविकृतिजन्यरोग अथवा कुष्ठरोग नाशक है। यह कासश्वासशामक, क्षयरोगहर, उत्तम पाण्डु- रोगहर है। इसके सेवन से वातकफार्श तथा ग्रहणीरोगमें शीघ्र आराम आता है। नेत्ररोगों के लिये ताम्र उत्तम माना जाता है। शरीर में दिन प्रतिदिन बढ़नेवाले मोटापे का यह नाशक है। इस प्रकार ताम्रभस्म प्रायः अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करती है। ताम्रभस्म ज्वरनाशक, व्रणनाशक, रुचिकारक, गरविषहर, उदररोगनाशक, आयुवर्धक, वामक और विरेचक मानी जाती हैं ॥ ४६, ४७ ॥ अपि च रविप्रियन्तु सुमृतं परं शूलनिषूदनम्। अम्लपित्तप्रशमनं यकृत्प्लीहोदर ऽपहम् ॥ ४८ ॥ अपस्मारप्रशमनं विषूचीवमिनाशनम्। आक्षेपापहमत्यन्तं तथा खल्लीप्रणाशनम् ॥ ४६ ॥ अग्निमान्द्यहरञ्चैवं परिणामाख्यशूलनुत्। अन्यच्चोपान्तकृच्छ्रञ्चापि समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ५० ॥

उभयतः परिशोधनं पक्वशुद्धामृतीकृतदशायां प्रभावात् दोषनिःसारकत्वा- दिति । विषूचीं वमिञ्चेति समुच्चयः । आक्षेपो वातव्याधिविशेषः ॥४८-५०॥ भा.टी.—ताम्रभस्म उत्तम शूलनाशक, अम्लपित्तशामक, यकृत्प्लीहारोगहर, अपस्माररोगनाशक, विसूचिका तथा वमनरोग निवारक है । इसके प्रयोग से शरीर में होनेवाले आक्षेप तथा खल्ली आना बन्द हो जाता है । पुरातन अग्नि- मान्द्य रोग तथा परिणामशूल के लिये यह उत्तम गुणकारक मानी जाती है । आंतों में होनेवाले क्षय रोगों की उत्तम औषधि मानी गयी है ॥४८-५०॥ वक्तव्य—ताम्रभस्म आमाशय के लिये बल्य तथा आंतों के लिये ग्राही एवं उत्तम जीवाणुहर है। ताम्रभस्म आंतों की वातनाड़ियों के क्षोभों को शान्त करने के कारण शूलहर भी है। हृदय तथा श्वास संस्थान के लिये ताम्रभस्म का प्रभाव मन्दताकर है, क्योंकि इसको देने से इन केन्द्रों में मन्दता आ जाती है अतः क्षोभनिवारक है । ताम्रभस्म नाड़ीसंस्थान के लिये उत्तम बल्य है । इसके द्वारा वातनाड़ीजन्य उपद्रवों का शमन होता है । त्वचा के लिये यह सोमल के समान ही त्वच्य या बल्य है । ताम्रभस्म के प्रयोग से यकृत्प्लीहावृद्धि घट जाती है । क्योंकि ताम्रभस्म सेवन करने के बाद यह यकृत्प्लीहा में सञ्चित पाया जाता है । इसलिये प्लीहासञ्चित विषमज्वर के जीवाणुओं पर सम्भवतः ताम्र- भस्म का घातक प्रभाव होता है । आमाशय में उत्पन्न हुए फोड़े में, वातप्रधान कफप्रधान मांसार्बुद में ताम्रभस्म का अच्छा प्रभाव देखा जाता है । ताम्रभस्म के प्रयोग से पित्ताशयशोथ शान्त होती है जिससे पित्ताश्मरी नहीं होने पाती है। ताम्रभस्म के सेवन से यकृत्पित्त का स्राव ठीक रूप से और नियमितरूप से होने लगता है। अतः ताम्रभस्म यकृत्शोथ वृद्धिजन्य जलोदर में अत्यन्त लाभ- दायक होती है । ताम्रभस्म लेखनगुण होने से पाचकसंस्थान की कफग्रन्थि, गुल्म आदि में लाभ करती है । विसूचिका की अन्तिम अवस्था में जब हृदय- दुर्बलता के कारण नाड़ी क्षीण हो जाती है और शीतांग हो जाता है तो ताम्र- भस्म हृदय को अतिबल पहुँचाती है । विसूचिका की प्रथमावस्था में देने से यह विसूचिका दोष में कृमियों को ही मार देती है । और विसूचिका में हाथ पैरों में होनेवाले ऐंठन भी शान्त हो जाते हैं । ताम्रभस्म वक्षोदरमध्यस्थ मांसपेशी के लिये बल्य होने से हिक्कारोग में लाभदायक होती है। अम्लपित्त तथा परिणामशूलरोग में ताम्रभस्म सञ्चित पित्त को निकालने और फिर-पित्त- स्राव को नियमित करने के लिये दी जाती है ।

४२२ रसतरङ्गिणी निष्क्रमण—ताम्र मल, मूत्र, स्वेद, पित्त तथा लालास्राव द्वारा शरीर से बाहर निकलतां है । अतः ताम्र का उक्त आन्त्र आदि अंगों में विशेष प्रभाव होता है । ताम्रविकार—अशुद्ध ताम्र खाने से उक्त वमन, भ्रम, दाह आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी दशा में रोगी को विरेचन देकर शीघ्र ही ताम्र को शरीर से बाहर निकाल देना चाहिये और धनियाँ का शीतकषाय दिन में तीन- चार बार पिलाना चाहिये । भोजन मे दूध, चावल और घृत देना चाहिये । विशिष्टगुणाः मृतन्तु ताम्रं शमयत्यवश्यं शाखाश्रितं कोष्ठसमाश्रितं वा । जत्रूर्ध्वगञ्चापि मलाभिधानं पित्तं कफञ्चापि परं प्रवृद्धम् ॥५१॥ अवश्यमिति नियतानुभवः । शाखा बाहू सक्थिनी चेति, यत्तु शाखारक्ता- द्यस्त्वक् चेति प्राचीनपरिभाषितम् , तस्यात्र नोपयोगः, तावता कोष्ठादिग्रहणा- भावप्रसङ्गात् । जत्रु ग्रीवासन्धिः । मलाभिधानमिति प्रसादमलभेदेन धातुद्वै- विध्यं प्रसिद्धं चरकादौ, तत्र मलरूपमिति भावः ॥ ५१ ॥ भा.टी.—मृतताम्र भस्म का प्रयोग करने से शाखा ( हाथ पैर ) और कोष्ठ ( आमाशयादि ) के रीग और गले के ऊपरी भाग में स्थित वात तथा कफजन्य रोग दूर होते हैं । ॥ ५१ ॥ ताम्रस्य मात्रानिरूपणम् अष्टमांशाद्रक्तिकाया रक्तिकार्द्धमितं परम् । मृतं ताम्रं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५२ ॥ मात्रानिर्देशः कालबलापेक्षया अवश्यं करणीय इति तदेतदुक्तं बलका- लाद्यपेक्ष्येति ॥ ५२ ॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्र के भस्म को बल-काल आदि का विचार करके एक चावल ( १/८ रत्ती) से लेकर आधी रत्ती तक मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ॥५२॥ अथ मृतताम्रस्य आमयिकः प्रयोगः समरसवलिनिम्बूद्रावपिष्ट्या विपक्वम् त्रिकटुमरिचयुक्तं रक्तिकार्द्ध तु ताम्रम् । अपहरति नितान्तं हस्तकम्पादिवातं त्वपनयति च कामं पक्षाघातादिरोगान ॥५३॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४२३ गुञ्जार्द्धमात्रं खलु सूर्यलोहं द्विरक्तिकोशीररजोविमिश्रम् । सनागपुष्पं शिशिरेण वारा पीतं हरत्येव जवेन मूर्च्छाम् ॥५४॥ रविप्रियं शीलितमाज्ययुक्तं दुरालभाक्वाथविमिश्रितन्तु । विन्नाशयत्याशु गदं भ्रमाख्यं यथा समीरः खलु मेघवृन्दम् ॥५५॥ करञ्जबीजोत्थरजोविमिश्रं गुञ्जार्द्धमात्रं मृतसूर्यलोहम् । पित्तोद्भवं वापि कफोत्थितं वा शूलं निहन्यान्नहि संशयोऽत्र ॥ ५६॥ कटुत्रिकाख्यं मृतशङ्खयुक्तं गुञ्जार्द्धमात्रं खलु सूर्यलोहम् । प्लीहानमत्युग्ररुजं समन्ताद् निहन्ति मासैकनिषेवणेन ॥५७॥ वराटभस्मसंयुक्तं द्विगुञ्जजीरकान्वितम् । रविप्रियन्तु शीलितं निहन्ति सूतिकामयम् ॥ ५८ ॥ कणाचूर्णसमायुक्तं मधुना परिशीलितम् । रविप्रियं समाख्यातं त्वग्निसन्दीपनं परम् ॥५९॥ धात्रीचूर्णसमायुक्तं ताम्रं गुञ्जाद्वैसम्मितम् । अम्लपित्तं निहन्त्याशु वृक्षं शक्राशनिर्यथा ॥६०॥ भार्ङ्गीवभीतकोपेतं गुञ्जार्द्धप्रमितं मृतम् । ताम्रं क्षौद्रेण संलीढं कासश्वासं व्यपोहति ॥६१॥ नागपुष्पाभयामिश्रं ताम्रकं मधुसंयुतम् । शीलितं मासमात्रेण सर्व्वाण्यर्शांसि नाशयेत् ॥ ६२ ॥ अश्वत्थवल्कभस्माढ्यं रविलोहन्तु शीलितम् । गुञ्जापादांशमात्रेण छर्दिं जयति दारुणाम् ॥६३ ॥ बीजपूरद्रवोपेतं रविलोहं समाक्षिकम् । निषेवितं निहन्त्याशु हिक्काः पञ्च सुदारुणाः ॥६४॥ रविलोहं तु सुमृतं केवलं बलिजारितम् । अञ्जनाद्विनिहन्त्याशु दोषान्पटलसंश्रितान् ॥ ६५ ॥ कटुत्रिकाख्यं खलु सूर्यलोहं कणाशिफाचूर्णयुतं तु लीढम् । क्षौद्रेण सप्ताहनिषेविते तु द्रुतं यकृद्दाल्युदरं निहन्ति ॥६६॥ कटुत्रिकक्षोदयुतं सघृतं रविलोहकम् । निहन्ति मधुना गुल्मतीसारांन् विशेषतः ॥ ६७ ॥ ताम्रं समविषं धूत्तद्रवेण परिभावितम् । शीलितं त्वार्द्रकद्रावैः सन्निपातं व्यपोहति ॥६८॥

४२४ रसतरङ्गिणी आर्द्रकस्वरसोपेतं ताम्रं तु परिशीलितम् । नागिनीवल्लमध्यस्थं गुल्मरोगं व्यपोहति ॥ ६९ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं रविलोहमनारतम् । कण्टकारीफलोद्भूतरजसा परिशीलितम् ॥ ७० ॥ सशब्दमाक्षेपयुतमानीलाननमण्डलम् । प्ररुद्धश्वासनिश्वासं कासं नाशयति द्रुतम् ॥ ७१ ॥ अत्यल्पमात्रया ताम्रं दग्धाश्वत्थत्वचाम्भसा । बर्हिपक्षविभूतिर्वा छर्दिं जयति दुर्जयाम् ॥ ७२ ॥ व्योषचित्रकणामूलमांसीभाङ्गींकषायतः । पिप्पल्यादिगणक्वाथयुतं वा रविलोहकम् ॥ ७३ ॥ तीव्रहृच्छूलसंयुक्तं तथाक्षेपसमन्वितम् । शीलितं नाशयत्याशु शूलं मक्कल्लसंज्ञकम् ॥ ७४ ॥ ताम्रं समस्वर्णयुतं जटामांसीरजोऽन्वितम् । शीलितं विनिहन्त्याशु त्वाक्षेपमतिदारुणम् ॥ ७५ ॥ प्रबद्धमुष्टिकं काममानीलाननमण्डलम् । पानाशानादिसमये घुर्घूरायितकण्ठकम् ॥ ७६ ॥ अत्यल्पकालिकं वापि दारुणं दीर्घकालिकम् । तथा पादोदरगतां खल्लीं खल्वतिदारुणाम् ॥ ७७ ॥ रेणुकाशुण्ठिकाकन्यासारदारुसितान्वितम् । अनारतं विशेषेण रविलाहं तु शीलितम् ॥७८॥ निम्नोदरे वक्षसि वा युतमाक्षेपपीडया । सचीत्कारं संप्रलापं दारुणाथ्यथान्वितम् ॥ ७९ ॥ सवर्मिं वा विषमिषायुतखल्लोसमन्वितम् । बाधकं वा रजारोधं विनाशयति सत्वरम् ॥ ८० ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं सुमृतं ह्यमृतीकृतम् । शीलितं रविलोहे तु मर्कपूरसंयुतम् ॥८१॥ श्वेतातितरलात्यच्छमलां भूयस्तृषान्विताम् । पादयोरुदरे वापि भृशं खल्लीसमन्विताम् ॥ ८२ ॥ प्रक्षीणनाडिकां काममानीलाननमण्डलाम् । शीलितं शमयत्याशु दारुणां तु विषूचिकाम् ॥ ८३ ॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४२५ कज्जलरससिन्दूरयुतं ताम्रं तु शीलितम् । आनीलङ्गं चातिफेनं परिश्रान्तकनीनिकम् ॥ ८४ ॥ सक्रन्दनं सचीत्कारं वारन्धाक्षेपमुल्बणम् । आरटत्प्रचलद्दन्तमपस्मारं विनाशयेत् ॥ ८५ ॥ लोहस्वर्णसमायुक्तं ताम्रं गन्धकजारितम् । शीलितं नाशयेत्याशु श्वासं परमदारुणम् ॥ ८६ ॥ प्रचुराक्षेपसंयुक्तमानीलमुखमण्डलम् । आश्वासपथसङ्कोचक्रियाप्रत्ययकारणम् ॥ ८७ ॥ तिक्तामृता पर्पटककिराताब्दकषायतः । ताम्रं तु शीलितं हन्ति पुनरावर्तकञ्ज्वरम् ॥ ८८ ॥ पुनर्नवानिशामेषशृङ्गीद्रवविभावितम् । ताम्रं गन्धहतं ख्यातं व्रणशोधनरोपणम् ॥ ८९ ॥ रविलोहं बलिहतं तोलकैकमितं शुभम् । तोलकाष्टमितं चैव सुघृष्टं रक्तचन्दनम् ॥ ९० ॥ भावितं भृङ्गुनीरेण तत्त्ववारं प्रयत्नतः । मधुनाञ्जनतः ख्यातं तिमिरापहमूत्तमम् ॥ ९१ ॥ तारताप्ययुतं ताम्रं चित्रकद्रवभावितम् । सूर्यावर्तादिकान् घोरान् शिरोरोगान् विनाशयेत् ॥ ९२ ॥ यवजाऽऽलसमायुक्तं रसगन्धकजारितम् । शीलितं रविलोहं तु मतं कुष्ठापहं परम् ॥ ९३ ॥ मृतताम्रस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—समरसबलिनिम्बूद्रावपिष्टथा विपक्वमिति रीत्यानया सपारदं ताम्रभस्मैव कृतमपनयति वातरोगसङ्घमिति भावः । ताम्रभस्म ३ गुञ्जा, उशीररजः २ रक्तिका, नागकेसरम् १ गुञ्जा, शीतजलं पलैकमिति मूर्च्छानाशोपयोगियोगः । भ्रमाख्यं रजःपित्तानिलाज्जाता चक्रारूढस्येव चेष्टा शिरोधूर्णनप्रायका या भ्रमः, ननु मिथ्याज्ञानरूप इति । करञ्जबीजोत्थरजोकि- मिश्रमिति— आहुश्च—“एक एव कुबेराक्षो हन्ति शूलशतानि च । किम्पुनर्यदि लभ्येत ताम्रभस्मसमन्वितः ॥” इति । तदेतद् ध्वनितं नहि संशय इति । मासैक- निपेवणेन इत्यवधिः क्रमापचययोगदशकः प्लीहः । सूतिकामयः “अङ्गमर्द्दो ज्वरः कम्पः पिपासा गुरुगात्रता । शोफः शूलातिसारौ च सूतिकारोगलक्षणम् ॥” इत्युक्तः, कणा पिप्पली, वृत्तं शक्राशनिर्यथेति शीघ्रतायां दृष्टान्तः । नागपुष्पं

४२६ रसतरङ्गिणी नागकेसरम्, रूक्षार्थिकं समधु । कणाशिफा पिप्पलीमूलम् । समविषं वत्सना- भसमानमात्रम्, नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् । अनरतं निरन्तरम् । कासविशेषणं भ्रशमतिमोहमोपाय । दग्धाश्वत्थत्वचाम्भसा इति पूर्वयोगात् किञ्चिद्विशेषः । मक्कल्लशूलं सूत्यामये प्रसिद्धम् । प्रबद्धमुष्टिकमित्यादिना दारुणाक्षेपस्यैव वर्णनं कृतमिति । तथा इति समुच्चयार्थः । कन्यासारः "मुसव्वर" इति ख्यातः, दारु- सिता त्वक्, वियमिषा वमनेच्छा । अमृतीकृतमिति विशेषतः सावधानीकरणम् । सर्वत्र भक्षणेऽमृतीकृतस्यैव प्रयोगव्यवहारात् । मदः कस्तूरिका । श्वेताचितरला- त्यच्छमलां मण्डसङ्काशमलामिति भावः । खल्ली वातव्याधिविशेषः—"खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलावमोटनी" इत्युक्तः । निगदव्याख्यातमन्यत् । अपस्मार- विशेषोपन्यासः तत्रैकव्यवहाराय । प्रत्ययोऽनुभूतिः । पुनरावर्तकः निवृत्त्य पुनरा- गतः । पुनर्नवादिस्रवरसविभावितं केवलगन्धहतं ताम्रं लेपात् व्रणान् शोधयति च । तत्त्ववारं चतुर्विंशतिवारम् । आदिपदेन अर्धावभेदकादिग्रहणम् ॥५३-६३॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण में समभाग शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक मिला नींबू के रस में मर्दन कर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँककर बनायी ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला आधी रत्ती ताम्रभस्म का सेवन कराने से यह हस्तकंप, ग्रीवाकंप तथा पक्षाघात आदि वातरोग नष्ट हो जाते हैं । आधी रत्ती ताम्रभस्म में दो रत्ती खस का चूर्ण, दो रत्ती नागकेशर मिलाकर शीतल जल के साथ सेवन करने से मूर्च्छा रोग में बहुत शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को गोघृत में मिलाकर रोगी को चटा दें, इसके अनन्तर दुरालभाक्वाथ पिलावें तो भ्रम रोग शीघ्र शान्त हो जाता है । पित्तप्रकोपजन्य अथवा कफप्रकोपजन्य शूल में आधी रत्ती ताम्रभस्म को दो रत्ती करञ्जबीजचूर्ण के साथ सेवन कराने से निःसन्देह लाभ होता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण तथा शंखभस्म में मिलाकर उचित अनुपान के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन करने से अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा में अवश्य आराम आ जाता है । सूतिका रोग में ताम्रभस्म आधी रत्ती लेकर उसमें दो रत्ती कर्पूरभस्म, दो रत्ती जीराचूर्ण मिलाकर गरम जल अथवा दशमूलकषाय अनुपान से सेवन किया जाता है। अग्निसंदीपन के लिए ताम्रभस्म को पिप्पलीचूर्ण में मिला- कर कुछ दिन सेवन किया जाता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को चार रत्ती आमलकी- चूर्ण में मिलाकर शीत जलानुपान से सेवन करनेपर शीघ्र ही अम्लपित्तरोग नष्ट हो जाता है । आधी रत्ती ताम्रभस्म भारंगी तथा बहेड़ाचूर्ण में मिला शहद के

सप्तदशस्तरङ्गः ४२७

साथ कुछ दिन सेवन करने से श्वास तथा कास रोग में आराम आता है । प्रायः सब प्रकार के अर्श में ताम्रभस्म को नागकेसर तथा हरीतकीचूर्ण में मिला शहद के साथ चटाने से एक मास में आराम आ जाता है । तीव्र वमन को रोकने के लिए चौथाई रत्ती ताम्र को पीपलवृक्षत्वक्भस्म के साथ मिला जल से सेवन किया जाता है । पाँचों प्रकार की अन्नजा येमला आदि हिक्काओं को दूर करने के लिए ताम्रभस्म और स्वर्णमाक्षिकभस्म को बिजौरा नींबू के रस से सेवन कराया जाता है । नेत्रपटलगत रोगों को दूर करने के लिए केवल गन्धक योग से बनायी हुई ताम्रभस्म को अञ्जन के रूप में व्यवहार किया जाता है । आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च पिप्पलीमूलचूर्ण के साथ मधु में मिलाकर एक सप्ताह तक सेवन करने से यकृद्दाल्युदर ( यकृतवृद्धि ) में शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला घी और शहद के साथ कुछ दिन चटाने से गुल्म विशेषतः अतीसार में आराम आता है । सन्निपात- ज्वर में जब लक्षण भयानक हो रहे हों तो ताम्रभस्म और शुद्ध वत्सनाभविष को समभाग में लेकर एकत्र खरल में धतूरे के स्वरस की सात भावना देकर सुखाकर रख लें । अब इसमें से आधी रत्ती से १ रत्ती मात्रा तक अदरक के रस से सेवन करायें । गुल्म रोग में ताम्रभस्म को पान के पत्ते में रखकर चबायें और अनुपान के रूप में अदरक का रस पिलायें तो गुल्म में आराम आता है । ताम्रभस्म को रससिन्दूर तथा कंटकारीफलचूर्ण में मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन करने से तीव्र वातिक कास (Whopping cough) जिससे खाँसते खाँसते शरीर में आक्षेप आने लगें और श्वासनिश्वास रुकने लगें तथा मुख नीला पड़ जाय उसमें शीघ्र आराम आता है । अतिदुर्धर्ष वमन को रोकने के लिए एक चावल भर ताम्रभस्म या मोरपंखभस्म को पीपल वृक्ष छाल की राख के जल से सेवन कराने पर शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पली, चित्रकमूल, पिप्पलीमूल, जटामांसी और भार्ङ्गीक्वाथ के साथ अथवा पिप्पल्यादिगण के क्वाथ के साथ सेवन से तीव्र हृदय शूल और आक्षेप (Conveltion) युक्त मकल शूल शीघ्र ही शान्त हो जाता है । ताम्रभस्म की स्वर्णभस्म तथा जटामांसीचूर्ण के साथ सेवन करने से अत्यन्त भयङ्कर आक्षेप जिसमें रोगी की दृढ़ मुष्टि (मुट्ठी) बँध जाती हो और मुखमण्डल नीला पड़ जाता हो, खाने या पीने के समय गले में से घुरघुर शब्द होता हो, देर तक रहनेवाला अथवा थोड़ी देर रहनेवाला वेगयुक्त आक्षेप हो अथवा पैर तथा पेट में होनेवाली तीव्र रूप से लल्ली (ऐंठन मांस- पेशियों की खिंचाहट) हो, इन सब अवस्थाओंसे युक्त वात रोग में शीघ्र

४२६ रसतरङ्गिणी

नागकेसरम्, रुच्चाञ्चिकं समधु । कणाशिफा पिप्पलीमूलम् । समविषं वत्सना- भसमानमात्रम्, नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् । अनारतं निरन्तरम् । कासविशेषणं भ्रममतिमोहमोपाय । दग्धाश्वत्थत्वचाम्भसा इति पूर्वयोगात् किञ्चिद्विशेषः । मक्कल्लशूलं सूत्यामये प्रसिद्धम् । प्रवृद्धमुष्टिकमित्यादिना दारुणाक्षेपस्यैव वर्णनं कृतमिति । तथा इति समुच्चयार्थः । कन्यासारः "मुसव्वर" इति ख्यातः, दारु- सिता त्वक्, विवमिषा वमनेच्छा । अमृतीकृतमिति विशेषतः सावधानीकरणम् । सर्वत्र भक्तरोऽमृतीकृतस्यैव प्रयोगव्यवहारात् । मदः कस्तूरिका । श्वेताचितरला- त्यच्छमलां मण्डसङ्काशमलामिति भावः । खल्ली वातव्याधिविशेषः—"खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलानमोटनी" इत्युक्तः । निगदव्याख्यातमन्यत् । अपस्मार- विशेषोपन्यासः तत्रैकव्यवहाराय । प्रत्ययोऽनुभूतिः । पुनरावर्तकः निवृत्त्य पुनरा- गतः । पुनर्नवादिस्वरसविभावितं केवलगन्धहतं ताम्रं लेपात् व्रणान् शोधयति च । तत्त्ववारं चतुर्विंशतिवारम् । आदिपदेन अर्धावभेदकादिग्रहणम् ॥५३–६३॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण में समभाग शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक मिला नींबू के रस में मर्दन कर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँककर बनायी ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला आधी रत्ती ताम्रभस्म का सेवन कराने से यह हस्तकंप, ग्रीवाकंप तथा पक्षाघात आदि वातरोग नष्ट हो जाते हैं। आधी रत्ती ताम्रभस्म में दो रत्ती खस का चूर्ण, दो रत्ती नागकेशर मिलाकर शीतल जल के साथ सेवन करने से मूर्च्छा रोग में बहुत शीघ्र आराम आता है। ताम्रभस्म को गोघृत में मिलाकर रोगी को चटा दें, इसके अनन्तर दुरालभाक्वाथ पिलावैं तो भ्रम रोग शीघ्र शान्त हो जाता है। पित्तप्रकोपजन्य अथवा कफप्रकोपजन्य शूल में आधी रत्ती ताम्रभस्म को दो रत्ती करञ्जबीजचूर्ण के साथ सेवन कराने से निःसन्देह लाभ होता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण तथा शंखभस्म में मिलाकर उचित अनुपान के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन करने से अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा में अवश्य आराम आ जाता है। सूतिका रोग में ताम्रभस्म आधी रत्ती लेकर उसमें दो रत्ती कर्पूरभस्म, दो रत्ती जीराचूर्ण मिलाकर गरम जल अथवा दशमूलकषाय अनुपान से सेवन किया जाता है। अग्निसंदीपन के लिए ताम्रभस्म को पिप्पलीचूर्ण में मिला- कर कुछ दिन सेवन किया जाता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को चार रत्ती आमलकी- चूर्ण में मिलाकर शीत जलानुपान से सेवन करनेपर शीघ्र ही अम्लपित्तरोग नष्ट हो जाता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म भारंगी तथा बहेड़ाचूर्ण में मिला शहद के

सप्तदशस्तरङ्गः ४२७ साथ कुछ दिन सेवन करने से श्वास तथा कास रोग में आराम आता है । प्रायः सब प्रकार के अर्श में ताम्रभस्म को नागकेसर तथा हरीतकीचूर्ण में मिला शहद के साथ चटाने से एक मास में आराम आ जाता है । तीव्र वमन को रोकने के लिए चौथाई रत्ती ताम्र को पीपलवृक्षत्वक्भस्म के साथ मिला जल से सेवन किया जाता है । पाँचों प्रकार की अन्नजा येमला आदि हिक्काओं को दूर करने के लिए ताम्रभस्म और स्वर्णमाक्षिकभस्म को बिजौरा नींबू के रस से सेवन कराया जाता है । नेत्रपटलगत रोगों को दूर करने के लिए केवल गन्धक योग से बनायी हुई ताम्रभस्म को अञ्जन के रूप में व्यवहार किया जाता है । आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च पिप्पलीमूलचूर्ण के साथ मधु में मिलाकर एक सप्ताह तक सेवन करने से यकृद्दाल्युदर ( यकृतवृद्धि ) में शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला घी और शहद के साथ कुछ दिन चटाने से गुल्म विशेषतः अतीसार में आराम आता है । सन्निपात- ज्वर में जब लक्षण भयानक हो रहे हों तो ताम्रभस्म और शुद्ध वत्सनाभविष को समभाग में लेकर एकत्र खरल में धतूरे के स्वरस की सात भावना देकर सुखाकर रख लें । अब इसमें से आधी रत्ती से १ रत्ती मात्रा तक अदरक के रस से सेवन करायें । गुल्म रोग में ताम्रभस्म को पान के पत्ते में रखकर चबायें और अनुपान के रूप में अदरक का रस पिलायें तो गुल्म में आराम आता है । ताम्रभस्म को रससिन्दूर तथा कंटकारीफलचूर्ण में मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन करने से तीव्र वातिक कास ( Whopping cough ) जिससे खाँसते खाँसते शरीर में आक्षेप आने लगें और श्वासनिश्वास रुकने लगें तथा मुख नीला पड़ जाय उसमें शीघ्र आराम आता है । अतिदुर्धर्ष वमन को रोकने के लिए एक चावल भर ताम्रभस्म या मोरपंखभस्म को पीपल वृक्ष छाल की राख के जल से सेवन कराने पर शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पली, चित्रकमूल, पिप्पलीमूल, जटामांसी और भार्ङ्गीकषाय के साथ अथवा पिप्पल्यादिगण के कषाय के साथ सेवन से तीव्र हृदय शूल और आक्षेप ( Conveltion ) युक्त मक्कल शूल शीघ्र ही शान्त हो जाता है । ताम्रभस्म को स्वर्णभस्म तथा जटामांसीचूर्ण के साथ सेवन करने से अत्यन्त भयङ्कर आक्षेप जिसमें रोगी की दृढ़ मुष्टि ( मुट्ठी ) बँध जाती हो और मुखमण्डल नीला पड़ जाता हो,- खाने या पीने के समय गले में से घुरघुर शब्द होता हो, देर तक रहनेवाला अथवा थोड़ी देर रहनेवाला वेगयुक्त आक्षेप हो अथवा पैर तथा पेट में होनेवाली तीव्र रूप से खल्ली ( ऐंठन मांस- पेशियों की खिंचाहट ) हो, इन सब अवस्थाओंसे युक्त वात रोग में शीघ्र

४२८ रसतरङ्गिणी आराम आता है । कुछ काल निरन्तर ताम्रभस्म को सम्भालुबीज, सोंठ, एलुआ ( मुसव्वर ) और दालचीनी चूर्ण के साथ सेवन करने से भयंकर कष्ट रज तथा रजरोध ( जिसमें पेट प्रदेश अथवा वक्षःप्रदेश में तीव्र आक्षेप युक्त पीड़ा होती हो अथवा तीव्र पीड़ा के कारण रोगिणी चीखती प्रलाप करती हो, इसके साथ रुग्णा को वमन होती हो, जी मिचलाता हो और हाथ-पैरों की मांसपेशियों में खिंचावट के कारण खल्ली होती हो ) में आराम आता है । अमृतीकरण संस्कारयुक्त उत्तम ताम्रभस्म में रससिन्दूर, कस्तूरी और भीमसेनी कपूर मिलाकर सेवन कराने से भयंकर विसूचिका ( हैजा ) जिसमें अत्यन्त पतला, चावलों के धोवन के समान सफेद दस्त होंवें और भयंकर प्यास लगने के साथ रोगी के पैरों तथा पेट में भयंकर खल्ली ( ऐंठन हो और नाड़ी गति बिलकुल क्षीण और मुखमण्डल नीला पड़ गया हो ) में बहुत शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को पारद गन्धक की कजली तथा रससिन्दूर में मिलाकर सेवन करने से भयंकर प्रकार के अपस्मार ( जिससे होठ नीले पड़ गये हों, मुख से झाग गिरते हों, नेत्रों की पुतलियाँ टेढ़ी पड़ गयी हों, रोगी रोता या चीख सी मारता हो और शरीर में तीव्र आक्षेप आते हों, दाँतों को चबाता और खाता हो) में आराम आता है । गन्धक के योग से बनायी हुई उत्तम ताम्रभस्म को लोहभस्म और स्वर्णभस्म में मिलाकर सेवन करने से भयंकर श्वास रोग (जिसमें तीव्र आक्षेप तथा मुखमण्डल नीलवर्ण हो जाता हो और रोगी को ऐसा अनुभव होता हो कि उसका श्वास रुक जाने से प्राण निकल रहे हैं ) में लाभ होता है । पुनरावर्तकज्वर ( Relapsing Fever ) में ताम्रभस्म को कुटकी, गिलोय, पित्तपापड़ा, चिरायता और नागरमोथा कषाय के साथ सेवन कराया जाता है । गन्धक योग से बनी हुई ताम्रभस्म को पुनर्नवा, हल्दी काकड़ासिंगी या मेढ़ासिंगी के कषाय की भावना देकर व्रणों पर लेप करने से व्रण शुद्ध होकर भरने लगते हैं । गन्धकयोग से भस्म किया हुआ ताम्र एक तोला, लाल- चन्दन का बुरादा आठ तोला लेकर इन दोनों को एकत्र खरल में भांगरे के स्वरस की चौबीस भावना देकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें । अब इस चूर्ण को मधु में मिला आँखों में आँजने से तिमिर रोग नष्ट होता है । उत्तम ताम्रभस्म के सम- भाग रजतभस्म और स्वर्णमाक्षिक मिलाकर चित्रक कषाय की सात भावना देकर उचित मात्रा में सेवन करने से सूर्यावर्त ( सूर्य के उगने के साथ शिर में होनेवाली और सूर्य के साथ बढ़ने-घटनेवाली शिर पीड़ा ) तथा अर्धावभेदक ( आधा सीसी ) आदि शिरोरोगों में लाभ होता है । कुष्ठ रोग को नष्ट करने के

सप्तदशस्तरङ्गः ४२६ लिए पारद गन्धक की कजली से बनी हुई ताम्रभस्म में जवाखार और हरताल- भस्म मिला प्रयोग किया जाता है ॥ ५३-६३ ॥ वक्तव्य—पिप्पल्यादिगणकषाय श्लेष्मज्वर में लिखा है, परन्तु अनुभव से वह मक्कल्लशूल (जो कि प्रसव होने के बाद गर्भाशय में से अशुद्ध रक्त रुकने के कारण होता है) में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। उसका पाठ इस प्रकार है—“पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम्। मरिचैलाजमोदेन्द्र- पाठारेणुकजीरकम् ॥ भार्गी महानिम्बफलं हिङ्गुरोहिणिसर्षपम्। विडङ्गातिविषे मूर्वा चेत्ययं कीर्तितो गणः ॥ पिप्पल्यादिः” । रविताण्डवरसः पत्रीकृतं सुविमलं पलैकं रविलोहकम् । सूतद्विगुणगन्धाश्मकृतकज्जलिकां समाम् ॥ ६४ ॥ दत्त्वा कुमारीतोयेन पेषयेत्तु दिनत्रयम् । विधाय गोलकमथ शोषयेदातपे भृशम् ॥ ६५ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा हण्डिकायां निधापयेत् । आपूर्य भस्मनाऽऽकण्ठं चुल्लिकायां तु विन्यसेत् ॥६६॥ प्रखरेणानलेनाथ पचेदु यामत्रयं ततः । स्वांगशीतमथोद्धृत्य रविलं हं समाहरेत् ॥६७॥ निम्बूद्रवेण सम्पेष्य पुटयेत्सप्तधा ततः । म्रियते रविलोहं तु भस्म स्यात्कपिशं शुभम् । ६८॥ अस्य गुणाः रविलोहमिदं ख्यातं रविताण्डवसंज्ञकम् । परं भगन्दरहरं विशेषात्परिकीर्तितम् । ६६॥ रविताण्डवरसः—पुटयेदिति कपोताख्यपुटैनैव । शुभं वान्तिभ्रान्तिदिवर्जि- म् अत्र हि निम्बूद्रवेण सप्तधा पुटनमेवामृतीकरणम् ॥६४-६६॥ भा.टी.—स्वच्छ नेपाली ताम्र के कण्टकवेधीपत्र एक पल, पारद से द्विगुण गन्धक लेकर बनायी हुई कज्जली एक पल लेकर दोनों को एकत्र खरल में घीकुआर के गूदे में तीन दिन तक खूब मर्दन करके गोला सा बनालें । अब इस गोले को धूप में अच्छी तरह सुखाकर सम्पुट में बन्द करके एक बड़ी हांडी में रख दें और हांडी के अवशिष्ट भाग को गले तक अच्छी तरह दबा-दबाकर

४३० रस्तरङ्गिणी स्वच्छ राख से भर दें । इस हांडी को चूल्हे पर चढ़ा के नौ घण्टे की बहुत ही तीव्र अग्नि देकर पकायें, जब स्वतः शीत हो जाय तो हांडी के सम्पुट में ताम्र को निकालें । अब इस ताम्र को नींबू के रस में घोंटकर सूखा के एक संपुट में बन्द कर गजपुट में फूँक दें । नींबूरसवाली विधि को सात बार दुहराने से ताम्र की कुछ भूरे काले रंग की भस्म हो जाती है । यह रस भगंदर रोग में विशेष रूप से लाभदायक माना गया है ॥६४-६६ ॥ हृदयार्णवरसः कज्जलीद्विगुणं ताम्रं ह्यमृतीकृतमुत्तमम् । वरावारा काकमाचीद्रवेण परिमर्दयेत् ॥१००॥ वटिकाः कारयेद्वैद्यो रक्तिकापादसंमिताः । हृदयार्णवसंज्ञोऽयं रसो हृद्रोगनाशनः ॥१०१॥ हृदयार्णवरसे—वरावारा त्रिफलाजलेन ॥ १००-१०१ ॥ भा.टी.--शुद्ध पारदगन्धक की कज्जली एक भाग और अमृतीकरण क्रिया युक्त ताम्रभस्म दो भाग लेकर दोनों को एकत्र खरल में त्रिफलाकषाय और मकोय के स्वरस के साथ अच्छी तरह से मर्दन करें, जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी चौथाई रत्ती की गोलियाँ बना लें और धूप में सुखाकर रख लें । इसको हृदयार्णवरस कहते हैं । यह रस हृदयरोगनाशक माना जाता है ॥१००-१०१॥ त्र्यम्बकेश्वररसः सूक्ष्मपत्रीकृतं ताम्रं त्रिधा गोमूत्रशोधितम् । समाहरे द्विपञ्चार्थस्तोलकाष्टकसंमितम् ॥१०२॥ रसेश्वरं च विमलं पल रङ्गकसंमितम् । पेषयेदतियत्नेन निम्बू कद्रवयोगतः ॥१०३॥ चत्वारिंशत्तोलमितं गन्धकं विमलीकृतम् । दत्त्वा तु नागितावारा पेषयेद् दिनसप्तकम् ॥१०४॥ विधाय गोलकमथो सम्पुटस्थं तु कारयेत् । सन्धलेपं ततः कृत्वा त्वतिमन्दाग्नियोगतः ॥१०५॥ पचेद्भूधरयन्त्रेण यत्नतो यामपञ्चकम् । स्वांगशीतमथोद्धृत्य मृतं ताम्रं समाहरेत् ॥१०६॥ रविजोहमिदं ख्यातं सव्योषं वह्निमान्द्यहृत् । परमङ्गलवातघ्नं कम्पवातहरं परम् ॥१०७॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४३१ त्र्यम्बकेश्वरः - नागिनीवारिति ताम्बूलपत्ररसेन ॥ १०२-१०७ ॥ भा.टी.—नेपालजातीय ताम्र के सूक्ष्म पत्र बनाकर उनको अग्नि में तपा- तपाकर सात बार गोमूत्र में बुझाकर शुद्ध कर लें । अब इनमें से आठ तोला शुद्ध ताम्रपत्र, पाँच पल शुद्धपारद लेकर दोनों को एकत्र खरल में नींबू के रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करें। इसके अनन्तर इसमें चालीस तोला शुद्ध गन्धकचूर्ण डालकर पान के पत्तों के रस से दो दिन तक मर्दन कर गोला-सा बना लें । अब इस ताम्रगोलक को धूप में अच्छी तरह सुखाकर सम्पुट में बन्द करके अच्छी तरह सन्धि लेप कर दें । भूधरयन्त्र में रखकर अतिमन्द-मन्द अग्नि से पन्द्रह घण्टे तक पकायें । जब भूधरयन्त्र स्वागंशीत हो जाय तो संपुट में से ताम्र को निकालकर पीसकर रख लें । इस प्रकार बनायी हुई ताम्रभस्म को त्र्यंबकेश्वर रस कहते हैं । इसकी १/४ चौथाई रत्ती मात्रा लेकर उसमें सोंठ, मिर्च और पिप्पली का चूर्ण मिलाकर सेवन कराने से अग्निमान्द्य अर्धांगवात (लकवा) और कंपवात रोग में बहुत लाभ होता है ॥ १०२-१०७ ॥ सूर्यावर्तरसः सुमृतं रविलोहं तु तोलकाष्टकसंमितम् । सूताधगन्धककृतकज्जलीं ताम्रसंमिताम् ॥ १०८ ॥ दत्त्वा कुमारीनीरेण पेषयेदतियत्नतः । विधाय गोलकं सम्यगातपे परिशोषयेत् ॥ १०६ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा बालुकायन्त्रगं पचेत् । स्वाङ्गशीतमथोद्धृत्य रविलोहं समाहरेत् ॥ ११० ॥ सूर्यावर्तरसो ह्येष समाख्यातस्तु नामतः । विशेषेण मतश्चै तत्खलु श्वासनिषूदनम् ॥ १११ ॥ सूर्यावर्तरसः—विशेषतः श्वासरोगहरः ॥ १०८-१११ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह भस्म किया हुआ ताम्र आठ तोला और पारद से अर्धभागवाली कज्जली आठ तोला लेकर दोनों को एकत्र खरल में कुमारी- स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें । जब इसका गोला-सा बन जाय तो इसे धूप में सुखा लें । अब इस गोले को एक संपुट में अच्छी तरह बन्द कर अच्छी सन्धिलेप करके बालुकायन्त्र में रखकर दोपहर तक मन्द मन्द अग्नि से पकायें । यन्त्र के स्वांगशीत होने पर ताम्रभस्म को निकालकर पीस के रख लें । इसका