रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें४२६ रसतरङ्गिणी नागकेसरम्, रूक्षार्थिकं समधु । कणाशिफा पिप्पलीमूलम् । समविषं वत्सना- भसमानमात्रम्, नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् । अनरतं निरन्तरम् । कासविशेषणं भ्रशमतिमोहमोपाय । दग्धाश्वत्थत्वचाम्भसा इति पूर्वयोगात् किञ्चिद्विशेषः । मक्कल्लशूलं सूत्यामये प्रसिद्धम् । प्रबद्धमुष्टिकमित्यादिना दारुणाक्षेपस्यैव वर्णनं कृतमिति । तथा इति समुच्चयार्थः । कन्यासारः "मुसव्वर" इति ख्यातः, दारु- सिता त्वक्, वियमिषा वमनेच्छा । अमृतीकृतमिति विशेषतः सावधानीकरणम् । सर्वत्र भक्षणेऽमृतीकृतस्यैव प्रयोगव्यवहारात् । मदः कस्तूरिका । श्वेताचितरला- त्यच्छमलां मण्डसङ्काशमलामिति भावः । खल्ली वातव्याधिविशेषः—"खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलावमोटनी" इत्युक्तः । निगदव्याख्यातमन्यत् । अपस्मार- विशेषोपन्यासः तत्रैकव्यवहाराय । प्रत्ययोऽनुभूतिः । पुनरावर्तकः निवृत्त्य पुनरा- गतः । पुनर्नवादिस्रवरसविभावितं केवलगन्धहतं ताम्रं लेपात् व्रणान् शोधयति च । तत्त्ववारं चतुर्विंशतिवारम् । आदिपदेन अर्धावभेदकादिग्रहणम् ॥५३-६३॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण में समभाग शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक मिला नींबू के रस में मर्दन कर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँककर बनायी ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला आधी रत्ती ताम्रभस्म का सेवन कराने से यह हस्तकंप, ग्रीवाकंप तथा पक्षाघात आदि वातरोग नष्ट हो जाते हैं । आधी रत्ती ताम्रभस्म में दो रत्ती खस का चूर्ण, दो रत्ती नागकेशर मिलाकर शीतल जल के साथ सेवन करने से मूर्च्छा रोग में बहुत शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को गोघृत में मिलाकर रोगी को चटा दें, इसके अनन्तर दुरालभाक्वाथ पिलावें तो भ्रम रोग शीघ्र शान्त हो जाता है । पित्तप्रकोपजन्य अथवा कफप्रकोपजन्य शूल में आधी रत्ती ताम्रभस्म को दो रत्ती करञ्जबीजचूर्ण के साथ सेवन कराने से निःसन्देह लाभ होता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण तथा शंखभस्म में मिलाकर उचित अनुपान के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन करने से अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा में अवश्य आराम आ जाता है । सूतिका रोग में ताम्रभस्म आधी रत्ती लेकर उसमें दो रत्ती कर्पूरभस्म, दो रत्ती जीराचूर्ण मिलाकर गरम जल अथवा दशमूलकषाय अनुपान से सेवन किया जाता है। अग्निसंदीपन के लिए ताम्रभस्म को पिप्पलीचूर्ण में मिला- कर कुछ दिन सेवन किया जाता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को चार रत्ती आमलकी- चूर्ण में मिलाकर शीत जलानुपान से सेवन करनेपर शीघ्र ही अम्लपित्तरोग नष्ट हो जाता है । आधी रत्ती ताम्रभस्म भारंगी तथा बहेड़ाचूर्ण में मिला शहद के