भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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सप्तदशस्तरङ्गः ४३१ त्र्यम्बकेश्वरः - नागिनीवारिति ताम्बूलपत्ररसेन ॥ १०२-१०७ ॥ भा.टी.—नेपालजातीय ताम्र के सूक्ष्म पत्र बनाकर उनको अग्नि में तपा- तपाकर सात बार गोमूत्र में बुझाकर शुद्ध कर लें । अब इनमें से आठ तोला शुद्ध ताम्रपत्र, पाँच पल शुद्धपारद लेकर दोनों को एकत्र खरल में नींबू के रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करें। इसके अनन्तर इसमें चालीस तोला शुद्ध गन्धकचूर्ण डालकर पान के पत्तों के रस से दो दिन तक मर्दन कर गोला-सा बना लें । अब इस ताम्रगोलक को धूप में अच्छी तरह सुखाकर सम्पुट में बन्द करके अच्छी तरह सन्धि लेप कर दें । भूधरयन्त्र में रखकर अतिमन्द-मन्द अग्नि से पन्द्रह घण्टे तक पकायें । जब भूधरयन्त्र स्वागंशीत हो जाय तो संपुट में से ताम्र को निकालकर पीसकर रख लें । इस प्रकार बनायी हुई ताम्रभस्म को त्र्यंबकेश्वर रस कहते हैं । इसकी १/४ चौथाई रत्ती मात्रा लेकर उसमें सोंठ, मिर्च और पिप्पली का चूर्ण मिलाकर सेवन कराने से अग्निमान्द्य अर्धांगवात (लकवा) और कंपवात रोग में बहुत लाभ होता है ॥ १०२-१०७ ॥ सूर्यावर्तरसः सुमृतं रविलोहं तु तोलकाष्टकसंमितम् । सूताधगन्धककृतकज्जलीं ताम्रसंमिताम् ॥ १०८ ॥ दत्त्वा कुमारीनीरेण पेषयेदतियत्नतः । विधाय गोलकं सम्यगातपे परिशोषयेत् ॥ १०६ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा बालुकायन्त्रगं पचेत् । स्वाङ्गशीतमथोद्धृत्य रविलोहं समाहरेत् ॥ ११० ॥ सूर्यावर्तरसो ह्येष समाख्यातस्तु नामतः । विशेषेण मतश्चै तत्खलु श्वासनिषूदनम् ॥ १११ ॥ सूर्यावर्तरसः—विशेषतः श्वासरोगहरः ॥ १०८-१११ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह भस्म किया हुआ ताम्र आठ तोला और पारद से अर्धभागवाली कज्जली आठ तोला लेकर दोनों को एकत्र खरल में कुमारी- स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें । जब इसका गोला-सा बन जाय तो इसे धूप में सुखा लें । अब इस गोले को एक संपुट में अच्छी तरह बन्द कर अच्छी सन्धिलेप करके बालुकायन्त्र में रखकर दोपहर तक मन्द मन्द अग्नि से पकायें । यन्त्र के स्वांगशीत होने पर ताम्रभस्म को निकालकर पीस के रख लें । इसका