रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 458, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें४३० रस्तरङ्गिणी स्वच्छ राख से भर दें । इस हांडी को चूल्हे पर चढ़ा के नौ घण्टे की बहुत ही तीव्र अग्नि देकर पकायें, जब स्वतः शीत हो जाय तो हांडी के सम्पुट में ताम्र को निकालें । अब इस ताम्र को नींबू के रस में घोंटकर सूखा के एक संपुट में बन्द कर गजपुट में फूँक दें । नींबूरसवाली विधि को सात बार दुहराने से ताम्र की कुछ भूरे काले रंग की भस्म हो जाती है । यह रस भगंदर रोग में विशेष रूप से लाभदायक माना गया है ॥६४-६६ ॥ हृदयार्णवरसः कज्जलीद्विगुणं ताम्रं ह्यमृतीकृतमुत्तमम् । वरावारा काकमाचीद्रवेण परिमर्दयेत् ॥१००॥ वटिकाः कारयेद्वैद्यो रक्तिकापादसंमिताः । हृदयार्णवसंज्ञोऽयं रसो हृद्रोगनाशनः ॥१०१॥ हृदयार्णवरसे—वरावारा त्रिफलाजलेन ॥ १००-१०१ ॥ भा.टी.--शुद्ध पारदगन्धक की कज्जली एक भाग और अमृतीकरण क्रिया युक्त ताम्रभस्म दो भाग लेकर दोनों को एकत्र खरल में त्रिफलाकषाय और मकोय के स्वरस के साथ अच्छी तरह से मर्दन करें, जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी चौथाई रत्ती की गोलियाँ बना लें और धूप में सुखाकर रख लें । इसको हृदयार्णवरस कहते हैं । यह रस हृदयरोगनाशक माना जाता है ॥१००-१०१॥ त्र्यम्बकेश्वररसः सूक्ष्मपत्रीकृतं ताम्रं त्रिधा गोमूत्रशोधितम् । समाहरे द्विपञ्चार्थस्तोलकाष्टकसंमितम् ॥१०२॥ रसेश्वरं च विमलं पल रङ्गकसंमितम् । पेषयेदतियत्नेन निम्बू कद्रवयोगतः ॥१०३॥ चत्वारिंशत्तोलमितं गन्धकं विमलीकृतम् । दत्त्वा तु नागितावारा पेषयेद् दिनसप्तकम् ॥१०४॥ विधाय गोलकमथो सम्पुटस्थं तु कारयेत् । सन्धलेपं ततः कृत्वा त्वतिमन्दाग्नियोगतः ॥१०५॥ पचेद्भूधरयन्त्रेण यत्नतो यामपञ्चकम् । स्वांगशीतमथोद्धृत्य मृतं ताम्रं समाहरेत् ॥१०६॥ रविजोहमिदं ख्यातं सव्योषं वह्निमान्द्यहृत् । परमङ्गलवातघ्नं कम्पवातहरं परम् ॥१०७॥