रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशस्तरङ्गः ४२६ लिए पारद गन्धक की कजली से बनी हुई ताम्रभस्म में जवाखार और हरताल- भस्म मिला प्रयोग किया जाता है ॥ ५३-६३ ॥ वक्तव्य—पिप्पल्यादिगणकषाय श्लेष्मज्वर में लिखा है, परन्तु अनुभव से वह मक्कल्लशूल (जो कि प्रसव होने के बाद गर्भाशय में से अशुद्ध रक्त रुकने के कारण होता है) में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। उसका पाठ इस प्रकार है—“पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम्। मरिचैलाजमोदेन्द्र- पाठारेणुकजीरकम् ॥ भार्गी महानिम्बफलं हिङ्गुरोहिणिसर्षपम्। विडङ्गातिविषे मूर्वा चेत्ययं कीर्तितो गणः ॥ पिप्पल्यादिः” । रविताण्डवरसः पत्रीकृतं सुविमलं पलैकं रविलोहकम् । सूतद्विगुणगन्धाश्मकृतकज्जलिकां समाम् ॥ ६४ ॥ दत्त्वा कुमारीतोयेन पेषयेत्तु दिनत्रयम् । विधाय गोलकमथ शोषयेदातपे भृशम् ॥ ६५ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा हण्डिकायां निधापयेत् । आपूर्य भस्मनाऽऽकण्ठं चुल्लिकायां तु विन्यसेत् ॥६६॥ प्रखरेणानलेनाथ पचेदु यामत्रयं ततः । स्वांगशीतमथोद्धृत्य रविलं हं समाहरेत् ॥६७॥ निम्बूद्रवेण सम्पेष्य पुटयेत्सप्तधा ततः । म्रियते रविलोहं तु भस्म स्यात्कपिशं शुभम् । ६८॥ अस्य गुणाः रविलोहमिदं ख्यातं रविताण्डवसंज्ञकम् । परं भगन्दरहरं विशेषात्परिकीर्तितम् । ६६॥ रविताण्डवरसः—पुटयेदिति कपोताख्यपुटैनैव । शुभं वान्तिभ्रान्तिदिवर्जि- म् अत्र हि निम्बूद्रवेण सप्तधा पुटनमेवामृतीकरणम् ॥६४-६६॥ भा.टी.—स्वच्छ नेपाली ताम्र के कण्टकवेधीपत्र एक पल, पारद से द्विगुण गन्धक लेकर बनायी हुई कज्जली एक पल लेकर दोनों को एकत्र खरल में घीकुआर के गूदे में तीन दिन तक खूब मर्दन करके गोला सा बनालें । अब इस गोले को धूप में अच्छी तरह सुखाकर सम्पुट में बन्द करके एक बड़ी हांडी में रख दें और हांडी के अवशिष्ट भाग को गले तक अच्छी तरह दबा-दबाकर