रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२८ रसतरङ्गिणी आराम आता है । कुछ काल निरन्तर ताम्रभस्म को सम्भालुबीज, सोंठ, एलुआ ( मुसव्वर ) और दालचीनी चूर्ण के साथ सेवन करने से भयंकर कष्ट रज तथा रजरोध ( जिसमें पेट प्रदेश अथवा वक्षःप्रदेश में तीव्र आक्षेप युक्त पीड़ा होती हो अथवा तीव्र पीड़ा के कारण रोगिणी चीखती प्रलाप करती हो, इसके साथ रुग्णा को वमन होती हो, जी मिचलाता हो और हाथ-पैरों की मांसपेशियों में खिंचावट के कारण खल्ली होती हो ) में आराम आता है । अमृतीकरण संस्कारयुक्त उत्तम ताम्रभस्म में रससिन्दूर, कस्तूरी और भीमसेनी कपूर मिलाकर सेवन कराने से भयंकर विसूचिका ( हैजा ) जिसमें अत्यन्त पतला, चावलों के धोवन के समान सफेद दस्त होंवें और भयंकर प्यास लगने के साथ रोगी के पैरों तथा पेट में भयंकर खल्ली ( ऐंठन हो और नाड़ी गति बिलकुल क्षीण और मुखमण्डल नीला पड़ गया हो ) में बहुत शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को पारद गन्धक की कजली तथा रससिन्दूर में मिलाकर सेवन करने से भयंकर प्रकार के अपस्मार ( जिससे होठ नीले पड़ गये हों, मुख से झाग गिरते हों, नेत्रों की पुतलियाँ टेढ़ी पड़ गयी हों, रोगी रोता या चीख सी मारता हो और शरीर में तीव्र आक्षेप आते हों, दाँतों को चबाता और खाता हो) में आराम आता है । गन्धक के योग से बनायी हुई उत्तम ताम्रभस्म को लोहभस्म और स्वर्णभस्म में मिलाकर सेवन करने से भयंकर श्वास रोग (जिसमें तीव्र आक्षेप तथा मुखमण्डल नीलवर्ण हो जाता हो और रोगी को ऐसा अनुभव होता हो कि उसका श्वास रुक जाने से प्राण निकल रहे हैं ) में लाभ होता है । पुनरावर्तकज्वर ( Relapsing Fever ) में ताम्रभस्म को कुटकी, गिलोय, पित्तपापड़ा, चिरायता और नागरमोथा कषाय के साथ सेवन कराया जाता है । गन्धक योग से बनी हुई ताम्रभस्म को पुनर्नवा, हल्दी काकड़ासिंगी या मेढ़ासिंगी के कषाय की भावना देकर व्रणों पर लेप करने से व्रण शुद्ध होकर भरने लगते हैं । गन्धकयोग से भस्म किया हुआ ताम्र एक तोला, लाल- चन्दन का बुरादा आठ तोला लेकर इन दोनों को एकत्र खरल में भांगरे के स्वरस की चौबीस भावना देकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें । अब इस चूर्ण को मधु में मिला आँखों में आँजने से तिमिर रोग नष्ट होता है । उत्तम ताम्रभस्म के सम- भाग रजतभस्म और स्वर्णमाक्षिक मिलाकर चित्रक कषाय की सात भावना देकर उचित मात्रा में सेवन करने से सूर्यावर्त ( सूर्य के उगने के साथ शिर में होनेवाली और सूर्य के साथ बढ़ने-घटनेवाली शिर पीड़ा ) तथा अर्धावभेदक ( आधा सीसी ) आदि शिरोरोगों में लाभ होता है । कुष्ठ रोग को नष्ट करने के