रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३२ रसतरङ्गिणी
.सूर्यावर्तंरस के नाम से कहा जाता है । यह रस श्वास-व्याधि पर विशेष रूप से लाभकारी है ॥ १०८-१११ ॥ शूलेभकेशरी-रसः- पलैकप्रमितं ताम्रं पारदं विमलं समम् । द्विपलं गन्धपाषाणं त्रिपलं शुद्धतालकम् ॥ ११२.॥ सम्मेल्य सर्वं यत्नेन पेषयेदहरद्वयम् । विशोष्य धर्मे च ततः सम्पुटस्थं तु कारयेत् ॥ ११३ ॥ अजापयःपिष्टटङ्कपिष्ट्या सन्धिं प्रलेपयेत् । ऊर्ध्वाधो लवणं दत्त्वा हण्डिकायां तु विन्यसेत् ॥ ११४ ॥ प्रखरेणानलेनाथ वारणाख्यपुटे पुटेत् । एवमेकपुटेनैव म्रियते रविलोहकम् ॥ ११५ ॥ समाख्यातो रसोऽयं तु ना ना शूलेभकेशरी । अमोघास्त्रमिदं ख्यातं मूलनिर्मूलने परम् ॥ ११६ ॥ शूलेभकेशरीरसः—वारणाख्यं पुटं गजपुटम् ॥ ११२-११६ ॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्र का चूर्ण एक पल, शुद्धगन्धक दो पल, शुद्ध- हरताल तीन पल लेकर, सबको एकत्र खरल में किसी द्रव के साथ पीसकर धूप में सुखा लें । पश्चात् इसको संपुट में बन्द करके संपुट की सन्धि की सुहागा और बकरी के दूध की पीठी से अच्छी तरह लेप करके सुखा लें । अब एक बड़ी हाँड़ी में आधे भाग तक लवण भर उस पर उक्त संपुट को रख दें । और हाँड़ी के अवशिष्ट भाग को फिर लवण से ऊपर गले तक अच्छी तरह भर दें और हाँड़ी के मुख में एक सकोरा रखकर उसको सन्धिलेप कर दें । अब लवणयुक्त हाँड़ी को गजपुट के बीच में रखकर फूँक दें । इस प्रकार एक ही पुट से ताम्र की भस्म हो जाती है । इस ताम्रभस्म को शूलेभकेशरीरस कहा जाता है । शूल को शान्त करने में यह कभी व्यर्थ न जानेवाला रस है । अर्थात् इसके सेवन से अवश्य ही शूल नष्ट हो जाता है ॥ ११२-११६ ॥ वक्तव्य—शूलेभकेशरी रस बनाने में पहिले पारद गन्धक की कज्जली बना लेनी चाहिये, फिर अन्य द्रव्य मिलाकर उसको नींबू के रस से मर्दन करना चाहिये । कई बार एक ही गजपुट से इसकी उत्तमभस्म नहीं होने पाती है । अतः दो या तीन गजपुट देने चाहिये ।