भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२८ सप्तदशस्तरङ्गः ४३३ अथ भूनागसत्त्वपातनप्रकारः वर्षर्तौ भूभुजगान् ऊर्णायुद्दीपुगुडैः । सौभाग्यालक्तकमषैः पिण्याकक्षोदयुतैः ॥११७॥ सम्पेष्य प्राज्ञवरो मूषास्थं वै प्रधमेत् । ताम्राभं सत्त्वमथो मुञ्चति क्षिप्रतरम् ॥११८ ॥ भूभुजगाः भूनागाः । ऊर्णायुः ऊर्णनाभिः ( मकड़ी का जाला इति हिन्दी भाषायाम् ) । उद्दीपः गुग्गुलुः । सौभाग्यं टङ्कणम् । अलक्तं लाक्षा । भग्नो मत्स्यः। पिण्याकक्षोदः तिलकिट्टचूर्णमिति यावत् । उक्तञ्च—“ताम्र भूमभूनागान्निशापिष्टान् समेन तान् । गुड़गुग्गुलुलाक्षोर्णामत्स्यपिण्याकटङ्कणैः ॥ दृढमेतैश्च संयोज्य मर्दयित्वा धमेत्सुखम् । मुञ्चन्ति ताम्रवत्सत्त्वं ते पद्मा अपि बर्हिणाम् ॥” इति ॥११७, ११८॥ भा.टी.—वर्षा ऋतु में प्रायः जमीन पर निकलनेवाले केचुओं को लेकर साफ करके धूप में सुखा लें । अब इनमें मकड़ी का जाला, गूगल, गुड़, सुहागा, लाख, शुष्क मछलियों का चूर्ण और तिल की खली, इन सब को पृथक् पृथक् केचुओं के बराबर मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करके एक दृढ मूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें तो इसमें से ताम्र के सदृश सत्त्व शीघ्र ही पृथक् हो जाता है ॥ ११७, ११८ ॥ भूनागसत्त्वस्य मारणम् भूनागसत्त्वं पलसंमितन्तु रसेश्वरं द्व्यक्षमितञ्च शुद्धम् । पलोन्मितं शुद्धसुगन्धचूर्णं दत्त्वा पुटेद् वन्यकरीषवह्नौ ॥११९॥ भूनागसत्त्वं पुटितं त्रिधैवं तन्नुत्तमां याति मृतिं निकामम् । रसागमाम्भोनिधिकर्णधारः प्रयोजयेत्ताम्रविधानरीत्या ॥ १२० ॥ अत्र ताम्रवदिति ताम्राद्भिन्नं सत्त्वं न ज्ञेयम् । इदं हि विशुद्धं ताम्रमेव भवति । अस्य मारणप्रकारो निगदव्याख्यातः । मारणानन्तरममृतीकरणं ताम्रो- क्तविधानेन कार्यमेव ॥ ११९, १२० ॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से प्राप्त भूनागसत्त्व एक पल ( आठ तोला ), शुद्ध पारद दो अक्ष ( चार तोला ) और शुद्ध गन्धकचूर्ण एक पल ( आठ तोला ) लेकर पहिले पारद गन्धक की कज्जली बना उसमें भूनागसत्त्व मिलाकर खूब मर्दन करें । अब इसको एक शरावसम्पुट में बन्द करके जंगली उपलों की अग्नि में फूँक दें । इस प्रकार तीन गजपुट देने से ताम्रसत्त्व भी भस्म हो जाती है । इस भस्म को वैद्यताम्रभस्म की विधि से ही प्रयोग में ला सकता है॥११६,१२०॥