भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४२२ रसतरङ्गिणी निष्क्रमण—ताम्र मल, मूत्र, स्वेद, पित्त तथा लालास्राव द्वारा शरीर से बाहर निकलतां है । अतः ताम्र का उक्त आन्त्र आदि अंगों में विशेष प्रभाव होता है । ताम्रविकार—अशुद्ध ताम्र खाने से उक्त वमन, भ्रम, दाह आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी दशा में रोगी को विरेचन देकर शीघ्र ही ताम्र को शरीर से बाहर निकाल देना चाहिये और धनियाँ का शीतकषाय दिन में तीन- चार बार पिलाना चाहिये । भोजन मे दूध, चावल और घृत देना चाहिये । विशिष्टगुणाः मृतन्तु ताम्रं शमयत्यवश्यं शाखाश्रितं कोष्ठसमाश्रितं वा । जत्रूर्ध्वगञ्चापि मलाभिधानं पित्तं कफञ्चापि परं प्रवृद्धम् ॥५१॥ अवश्यमिति नियतानुभवः । शाखा बाहू सक्थिनी चेति, यत्तु शाखारक्ता- द्यस्त्वक् चेति प्राचीनपरिभाषितम् , तस्यात्र नोपयोगः, तावता कोष्ठादिग्रहणा- भावप्रसङ्गात् । जत्रु ग्रीवासन्धिः । मलाभिधानमिति प्रसादमलभेदेन धातुद्वै- विध्यं प्रसिद्धं चरकादौ, तत्र मलरूपमिति भावः ॥ ५१ ॥ भा.टी.—मृतताम्र भस्म का प्रयोग करने से शाखा ( हाथ पैर ) और कोष्ठ ( आमाशयादि ) के रीग और गले के ऊपरी भाग में स्थित वात तथा कफजन्य रोग दूर होते हैं । ॥ ५१ ॥ ताम्रस्य मात्रानिरूपणम् अष्टमांशाद्रक्तिकाया रक्तिकार्द्धमितं परम् । मृतं ताम्रं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५२ ॥ मात्रानिर्देशः कालबलापेक्षया अवश्यं करणीय इति तदेतदुक्तं बलका- लाद्यपेक्ष्येति ॥ ५२ ॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्र के भस्म को बल-काल आदि का विचार करके एक चावल ( १/८ रत्ती) से लेकर आधी रत्ती तक मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ॥५२॥ अथ मृतताम्रस्य आमयिकः प्रयोगः समरसवलिनिम्बूद्रावपिष्ट्या विपक्वम् त्रिकटुमरिचयुक्तं रक्तिकार्द्ध तु ताम्रम् । अपहरति नितान्तं हस्तकम्पादिवातं त्वपनयति च कामं पक्षाघातादिरोगान ॥५३॥