भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

उभयतः परिशोधनं पक्वशुद्धामृतीकृतदशायां प्रभावात् दोषनिःसारकत्वा- दिति । विषूचीं वमिञ्चेति समुच्चयः । आक्षेपो वातव्याधिविशेषः ॥४८-५०॥ भा.टी.—ताम्रभस्म उत्तम शूलनाशक, अम्लपित्तशामक, यकृत्प्लीहारोगहर, अपस्माररोगनाशक, विसूचिका तथा वमनरोग निवारक है । इसके प्रयोग से शरीर में होनेवाले आक्षेप तथा खल्ली आना बन्द हो जाता है । पुरातन अग्नि- मान्द्य रोग तथा परिणामशूल के लिये यह उत्तम गुणकारक मानी जाती है । आंतों में होनेवाले क्षय रोगों की उत्तम औषधि मानी गयी है ॥४८-५०॥ वक्तव्य—ताम्रभस्म आमाशय के लिये बल्य तथा आंतों के लिये ग्राही एवं उत्तम जीवाणुहर है। ताम्रभस्म आंतों की वातनाड़ियों के क्षोभों को शान्त करने के कारण शूलहर भी है। हृदय तथा श्वास संस्थान के लिये ताम्रभस्म का प्रभाव मन्दताकर है, क्योंकि इसको देने से इन केन्द्रों में मन्दता आ जाती है अतः क्षोभनिवारक है । ताम्रभस्म नाड़ीसंस्थान के लिये उत्तम बल्य है । इसके द्वारा वातनाड़ीजन्य उपद्रवों का शमन होता है । त्वचा के लिये यह सोमल के समान ही त्वच्य या बल्य है । ताम्रभस्म के प्रयोग से यकृत्प्लीहावृद्धि घट जाती है । क्योंकि ताम्रभस्म सेवन करने के बाद यह यकृत्प्लीहा में सञ्चित पाया जाता है । इसलिये प्लीहासञ्चित विषमज्वर के जीवाणुओं पर सम्भवतः ताम्र- भस्म का घातक प्रभाव होता है । आमाशय में उत्पन्न हुए फोड़े में, वातप्रधान कफप्रधान मांसार्बुद में ताम्रभस्म का अच्छा प्रभाव देखा जाता है । ताम्रभस्म के प्रयोग से पित्ताशयशोथ शान्त होती है जिससे पित्ताश्मरी नहीं होने पाती है। ताम्रभस्म के सेवन से यकृत्पित्त का स्राव ठीक रूप से और नियमितरूप से होने लगता है। अतः ताम्रभस्म यकृत्शोथ वृद्धिजन्य जलोदर में अत्यन्त लाभ- दायक होती है । ताम्रभस्म लेखनगुण होने से पाचकसंस्थान की कफग्रन्थि, गुल्म आदि में लाभ करती है । विसूचिका की अन्तिम अवस्था में जब हृदय- दुर्बलता के कारण नाड़ी क्षीण हो जाती है और शीतांग हो जाता है तो ताम्र- भस्म हृदय को अतिबल पहुँचाती है । विसूचिका की प्रथमावस्था में देने से यह विसूचिका दोष में कृमियों को ही मार देती है । और विसूचिका में हाथ पैरों में होनेवाले ऐंठन भी शान्त हो जाते हैं । ताम्रभस्म वक्षोदरमध्यस्थ मांसपेशी के लिये बल्य होने से हिक्कारोग में लाभदायक होती है। अम्लपित्त तथा परिणामशूलरोग में ताम्रभस्म सञ्चित पित्त को निकालने और फिर-पित्त- स्राव को नियमित करने के लिये दी जाती है ।