भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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४२० रसतरङ्गिणी भा.टी.—ताम्रभस्म रस में तिक्त (कड़वी) तुवर (कषाय) तथा मधुर, पाक में कटु, वीर्य में उष्ण, आम्लरस, स्निग्धगुण, विषनाशक, पित्तनिःसारक, लेखक (वामक या शोथहर) होती है। इसके प्रयोग से पित्तप्रकोपजन्य, कफ- प्रकोपजन्य अथवा कफपित्तप्रकोपजन्य सभी प्रकार के पुरातन रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ वक्तव्य—उक्तगुण ताम्रभस्म के भौतिक गुण समझने चाहिये। प्रचीन रस ग्रन्थों में ये ताम्रभस्म गुण पाये जाते हैं, परन्तु किसी-किसी ने इसको शीतल भी माना है। वहाँ पर यह अत्यन्त मात्रा में अथवा स्पर्श में शीतल समझना चाहिये। अपि च ताम्रं दीपनमुत्तमं कृमिहरं कुष्ठामयध्वंसनं कासश्वासविधूननं क्षयहरं पाण्ड्वामयघ्नं परम्। दुर्नामग्रहणीगदप्रशमनं नेत्रामयेषूत्तमं स्थौल्यध्वंसकरं त्वलं बहुगिरा नानामयध्वंसनम् ॥ ४६ ॥ ताम्रं मृतं ज्वरहरं व्रणरोपणञ्च रुच्यं परं गदहरं ह्युदरामयघ्नम्। आयुष्यमप्युभयतः परिशोधनञ्च वैद्यैर्मतं खलु रसायनतन्त्रविद्भिः ॥४७॥ ताम्रं उत्तमं दीपनम् इति समन्वयः। दुर्नामानि अर्शांसि ॥ ४६, ४७ ॥ भा.टी.—ताम्रभस्म, उत्तमदीपक, उदरकृमिनाशक, रक्तविकृतिजन्यरोग अथवा कुष्ठरोग नाशक है। यह कासश्वासशामक, क्षयरोगहर, उत्तम पाण्डु- रोगहर है। इसके सेवन से वातकफार्श तथा ग्रहणीरोगमें शीघ्र आराम आता है। नेत्ररोगों के लिये ताम्र उत्तम माना जाता है। शरीर में दिन प्रतिदिन बढ़नेवाले मोटापे का यह नाशक है। इस प्रकार ताम्रभस्म प्रायः अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करती है। ताम्रभस्म ज्वरनाशक, व्रणनाशक, रुचिकारक, गरविषहर, उदररोगनाशक, आयुवर्धक, वामक और विरेचक मानी जाती हैं ॥ ४६, ४७ ॥ अपि च रविप्रियन्तु सुमृतं परं शूलनिषूदनम्। अम्लपित्तप्रशमनं यकृत्प्लीहोदर ऽपहम् ॥ ४८ ॥ अपस्मारप्रशमनं विषूचीवमिनाशनम्। आक्षेपापहमत्यन्तं तथा खल्लीप्रणाशनम् ॥ ४६ ॥ अग्निमान्द्यहरञ्चैवं परिणामाख्यशूलनुत्। अन्यच्चोपान्तकृच्छ्रञ्चापि समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ५० ॥

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