रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ अष्टादशस्तरङ्गः ४४६ रक्त के साथ अथवा हरिद्रा, केसर तथा चन्दन के साथ भैंस के दूध में मिला- कर कुछ दिन उबटन के रूप में मलने से आराम आता है। रससिन्दूर के साथ वंगभस्म का कुछ काल सेवन करने से प्रमेह और शुक्र की कमी दूर हो जाती है। शुक्रधातु के पतलेपन को दूर करने के लिये एक महीने तक निरन्तर रूप में वङ्गभस्म में मूसली का चूर्ण मिला कर सेवन करना चाहिए। पुराने जीर्ण- ज्वर में वङ्गभस्म को लाजवर्दभस्म और लोहभस्म तथा रससिन्दूर के साथ मिला कर चंदनक्वाथ के अनुपान से सेवन करने पर लाभ होता है। जत्रु से उपरी शरीर प्रदेश में होनेवाले नाड़ीशूल को नष्ट करने के लिये वङ्गभस्म में स्वर्ण- माक्षिकभस्म तथा रजतभस्म मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है ॥४७-६७॥ अथ स्वर्णवङ्गस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः कर्षत्रयमितं वंगं दर्व्यां न्यस्यानले न्यसेत् । विद्रुते तत्समं सूतं द्रुतं तत्र विनिक्षिपेत् ॥६८॥ द्रुतं निक्षिप्य खल्वे च पेषयेदतियत्नतः । आम्लेन केनचिच्चापि सह सम्मर्दयेत्ततः ॥६६॥ विमर्च सैन्धवं दत्त्वा बहुशः क्षालयेत्ततः । विशुद्धं गन्धकञ्चाथ दद्यादीश्वरसंमितम् ॥७०॥ चुल्लिकालवणञ्चैव बलितुल्यं विनिक्षिपेत् । सम्पेष्य चातियत्नेन श्लक्ष्णचूर्णंन्तु कारयेत् ॥७१॥ सवस्त्रमृत्तिका लिप्तकाचकूप्यां ततो न्यसेत् । यत्नतः सिकतायन्त्रे चतुर्यामं पचेत्ततः ॥७२॥ निर्धूमे जायमाने च काचकूपीमुखे भिषक् । संदंशेन गृहीत्वा च कूपीं भूमौ तु विन्यसेत् ॥७३॥ काचकूपीं विभिद्याथ कूपिकातलसंस्थितम् । स्वर्णवर्णं स्वर्णवङ्गं भिषग्रत्नः समाहरेत् ॥७४॥ कूपीभेदनकाले तु सूक्ष्मदर्शी भिषग्वरः । सूक्ष्मान् काचकणान् सम्यङ् निरीक्ष्य परिवर्जयेत् ॥७५॥ वंगं सञ्जायते यस्मात् कीर्णे स्वर्णकणैरिव । तस्माद्रसायनाचार्यैः स्वर्णवंगं प्रकीर्तितम् ॥७६॥ अथ स्वर्णवङ्गनिर्माणप्रकारः—अम्लसैन्धवाभ्यां सम्मर्द्य क्षालनं पिष्टिनेर्म-