भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४५५ सितासराज्यसंयुक्तं प्रतप्तदुग्धयोगतः । सुवर्णवङ्गपञ्चकं निषेवितं द्विमासकम् ॥ १०४ ॥ निहन्ति वै चिरोत्थितं तु शुक्रमेहमुल्बणम् । तथा करोति कामिनीमदापनाशनक्षमम् ॥ १०५ ॥ सुवर्णवंगपञ्चकरसायनम्—शिलामयं, शिलाजतु । स्मरः कामदेवस्तस्य ध्वजाङ्को ध्वजचिह्नं मकरः, तत्पूर्वकं मकरपूर्वकं ध्वजाह्वयं रसं मकरध्वजसंज्ञकं रसम् अभ्रतुल्यं दद्यादिति शेषः । सिता खण्डम्, सरः सन्तानिका ॥६६-१०५॥ इति वंगविज्ञानीयो नाम अष्टादशस्तरङ्गः भा.टी.—उत्तम स्वर्णवंग दो तोला, अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ सूर्य- तापी शिलाजीत दो तोला, तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) भस्म एक तोला, उत्तम वज्राभ्रक भस्म आधा तोला और उत्तम षड्गुणबलिजारित मकरध्वजरस आधा तोला लेकर सबको खरल में एकत्र जल के साथ मर्दन करके तीन-तीन रत्ती की गोली बना लें । इनको सुखाकर काँच की शीशी में रख लें । अब इन गोलियों में एक गोली सुबह और एक शाम को बल काल आदि का पूर्ण विचार कर दिन में दो बार योग्य अनुपान से सेवन करना चाहिये । इस योग को सुवर्णवंगपञ्चक रसायन कहते हैं । शुक्रमेह रोग को नष्ट करने में यह एक अचूक शस्त्र है । इसके सेवन से शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती है, उत्पादक अंग सबल होते हैं, बुद्धिशक्ति बढ़ने लगती है शुक्र की तरलता को दूर करने में यह विशेष रूप से लाभदायक है । स्वर्णवंग को दो मास तक घी और मिश्री मिश्रित मलाईवाले गरम दूध के साथ सेवन किया जाय तो भयंकर शुक्रमेह दूर हो जाता है ॥ ६६-१०५ ॥ यह वङ्गविज्ञानीय नाम अष्टादशतरङ्ग समाप्त हुआ । —०— अथ सीसकादिविज्ञानीय एकोनविंशस्तरङ्गः अथ सीसकस्य नामानि सीसकं शीषकं सीसं नागकं नागनामकम् । कुवङ्गकं कुरङ्गञ्च तथा सिन्दूरकारणम् ॥ १ ॥ क्रमप्राप्तसीसकनामानि तन्त्रे व्यवहारार्थम् । सिन्दूरकारणं सिन्दूरहेतुत्वात् नागस्य, सिन्दूरं हि नागसम्भवमिति ॥ १ ॥

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