भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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४५६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—सीसक, शीपक, सीस, नागक, सर्प के नाम—भुजंग, फणि, आशीविष, सर्प आदि, कुवङ्गक, कुरंग तथा सिन्दूरकारण, ये सब नाम सीसा धातु के कहे जाते हैं। क्योंकि इसमें से सिन्दूर प्राप्त किया जाता है, अतः इसको सिन्दूरयोनि लिखा है ॥ १ ॥ वक्तव्य—सीसक नैसर्गिक तौर से सीसकगन्धित (Lead sulphide) के रूप में मिलता है। काले सुरमे में सीसा अधिक पाया जाता है। सीसक की कच्ची धातु (सीसकगन्धित) को भूनकर उसमें से इसको पृथक् किया जाता है। यह चमकीली नीली भूरी-सी धातु है। स्पर्श में कोमल घिसने पर कागज पर लिखती है। खुली हवा में रखने से इसमें जंग नहीं लगता है, किन्तु गीली हवा में लग जाता है। सीसक काँर्बानित् होता है। सीसक को खूब तपाकर श्वेत कर दिया जाय तो इसका उर्ध्वपातन भी हो जाता है। भभके से शुद्ध किये हुए जल का सीसक पर कोई प्रभाव नहीं होता है, क्योंकि इसमें हवा नहीं होती। परन्तु अन्य कोमल जल जैसे वर्षाजल का इस पर शीघ्र प्रभाव होता है। वर्षा- जल में घुली हुई हवा की ओषजन सीसे के साथ मिलकर सीसे का ओषित् (oxide) बना देती है, यह ओषित् जल में घुलकर सीसक का उद्रित (Hybrate) बन जाती है। यद्यपि यह उद्रित बहुत थोड़ी होती है, तथापि इससे जल का स्वाद तथा प्रभाव बिगड़ जाता है। इसीलिए वर्षाजल को सीसे की बाल्टियों तथा टबों में नहीं रखा जाता है। नदी तथा कुओं के कठोर जल पर इसका बिलकुल प्रभाव नहीं होता है। सीसे का आपेक्षिक गुरुत्व 11.34 से लेकर 11.37 तक है। Atomic भार 207.22 है, सीसक 325°c तापांश पर उबलने लगता है। ग्राह्यसीसकस्य स्वरूपम् सुगौरवं मृदु स्निग्धं छेदने मलिनोज्ज्वलम् । बहिःश्यामं द्रुतद्रावं सीसकं जात्यमादिशेत् ॥ २ ॥ ग्राह्यसीसकस्वरूपं सुगौरवंमिति—मलिनोज्ज्वलं मलिनं कृष्णं, उज्ज्वलं किचक्ययुतम् । तथाऽतो विपरीतं हेयसीसकमिति ॥ २ ॥ भा.टी.—अच्छा वजनदार, कोमल, स्निग्ध, छैनी से काटने पर कुछ मलिन साफ (चमकदार), बाहर से देखने पर श्यामवर्ण, अन्य धातुओं की अपेक्षा अग्नि पर रखने से शीघ्र पिघलनेवाले सीसे को उत्तम समझना चाहिये ॥२॥