रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशस्तरङ्गः ४५७ अग्राह्यसीसकस्य स्वरूपम् बहिः शुक्लं भारहीनं रूक्षं छेदे च निष्प्रभम् । समलं कठिनद्रावं सीसकं हेयमादिशेत् ॥ ३ ॥ भा.टो.—बाहर से देखने पर सफेद, अल्पभार, खुश्क, काटने पर चमक- रहित, धात्वन्तरयोगयुक्त और देर में पिघलनेवाला सीसक औषधि-कार्य में अग्राह्य समझना चाहिये ॥ ३ ॥ सीसकशोधनस्य प्रयोजनम् सीसं निहन्ति विमलां तु शरीरशोभां कुष्ठं किलासकमलं जनयेच्च नूनम् । सन्धीन् प्रपीडयति पक्षवधं प्रकुर्यात् संशुद्धिहीनमिह चेत् खलु मारितं स्यात् ॥ ४ ॥ शुद्धिपाकविहीनन्तु सीसकं परिशीलितम् । गुल्मं प्रमेहमानाहं श्वयथुञ्च भगन्दरम् ॥ ५ ॥ वह्निमान्द्यं त्वंसशोथं बाह्रोर्निश्चेष्टतां तथा । शूलं क्षयादिकान् रोगान् जनयेदविकल्पतः ॥ ६ ॥ सीसकशोधनप्रयोजनम्—स्पष्टप्रायम् । अंसशोथबाहुनिश्चेष्टतादि प्राचीना- नुक्तमपि स्फुटप्रतीयमानत्वादुक्तम् । अविकल्पतः सन्देहराहित्येन आवश्यक- मित्यर्थः । पाकविहीनमिति दोषाश्चैते मनःशिलातालगन्धकमन्तरा मारितनाग- सेवनादप्युपजायन्त इति ज्ञेयम् ॥ ४–६ ॥ भा.टी.—बिना शुद्ध किये सीसक की भस्म का सेवन करने से शरीर में रक्त विकृत होने से सारे शरीर की शोभा नष्ट हो जाती है और शरीर में सफेद कोढ़ तथा त्वक्रोग उत्पन्न हों जाते हैं । इसके सेवन से सन्धियों में कष्ट हो जाता है और पक्षाघात रोग हो जाता है । इसी तरह अशुद्ध सीसकभस्म सेवन से गुल्म, प्रमेह, आनाह, शोथ, भगन्दर, अग्निमान्द्य, अंस (कन्धा) शोथ, भुजाओं में अकर्मण्यता, उदरशूल तथा क्षय आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः सीसक को अवश्य ही अच्छी प्रकार से शुद्ध कर भस्म करना चाहिये ॥ ४–६ ॥ सीसकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः सीसकं दर्विकासंस्थं चुल्लिकायां निधापयेत् । विद्रुतञ्चाथ विज्ञाय रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ७ ॥