रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६० रसतरङ्गिणी अथवा कांजी से खूब अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें और सम्पुट में बन्दकर पुट में फूँक दें। इस प्रकार मैनसिल के साथ तीन पुट देने से सीसक की भस्म हो जाती है। दूसरे और तीसरे पुट में भी समभाग मैनसिल डालनी चाहिये। इस प्रकार भस्म किये हुए सीसक को निःशंक होकर व्यवहार में ला सकते हैं। उक्त विधि से बनायी हुई सीसकभस्म, कज्जल के सदृश श्लक्ष्ण और विशद होती है। इसके सेवन से पक्षाघात, शूल आदि नागविकार उत्पन्न नहीं होते हैं ॥ ११-१८ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विशुद्धं सीसमादाय कटाहे तु निधापयेत् । चुल्लिकायां निधायाथ वह्निं प्रज्वाल्य गालयेत् ॥ १९ ॥ सीसकं विद्रुतं ज्ञात्वा स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः । विशुद्धकुनटीचूर्णं तुल्यं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥ २० ॥ सीसभस्म भवेद् यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा सीसभस्म समाहरेत् ॥ २१ ॥ भस्मतुल्यं बलिं दत्त्वा निम्बूनीरेण मर्दयेत् । घर्म विशोष्य यत्नेन संपुटस्थं ततः पुटेत् ॥ २२ ॥ इत्थं त्रिभिः पुटैरेव सीसकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं सीसकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ द्वितीयः प्रकारो मनःशिलाप्रलेपसाध्यो गन्धकेन त्रिधा पुटनात् सम्पादनीयश्च वीतशङ्कः नागदोषभयरहितः ॥ ॥ १६-२३ ॥ भा.टी.-शुद्ध सीसे को लेकर एक लोहे की कड़ाही में डालें और कड़ाही को चूल्हे पर रखकर अग्नि जला दें और सीसे को पिघलने पर उसमें समभाग शुद्ध मैनसिल थोड़ा-थोड़ा करके तब तक डालकर करछी से रगड़ते जायँ जब तक कि सीसे की भस्म न हो जाय । कड़ाही के स्वतःशीत होने पर सीसे की भस्म को निकाल खरल में डालें और उसमें समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर नींबू के रस से मर्दन करें और अन्त में धूप में सुखा दें। अब इस शुष्कचूर्ण को सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें। इस प्रकार तीन पुट देने से सीसे की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ १६-२३ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः नागं विशुद्धन्तु कटाहसंस्थं प्रद्रावयेत्तीव्रतरानलेन । द्रुतन्तु विज्ञाय भिषग्वरेण्यो मयूरचूर्णं क्रमशः क्षिपेद्वै ॥२४॥