भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकोनविंशस्तरङ्गः ४६१ वासां विशुष्कां च समान्तु दत्त्वा सञ्चालयेद्वै वृषदण्डदर्व्या । सुचूर्णितञ्चाथ विलोक्य वैद्यः प्रक्षालयेदच्छजलेन कामम् ॥ २५ ॥ चूर्णं समादाय ततो रसङ्गं तुल्यां मनोज्ञां विमलां तु दत्त्वा । वासारसेनाथ विमर्द्य सम्यक् पुटेत् त्रिवारं रसतन्त्रवैद्यः ॥ २६ ॥ भस्म संजायते श्लक्ष्णं विशदं कज्जलप्रभम् । पक्षाघातादिकान् नागदोषान् नैव करोति च ॥ २७ ॥ सुचिरं सेवनेनापि विकारान्नैव दर्शयेत् । अतो रसायनाचार्यो वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २८ ॥ तृतीयः प्रकारः— मयूरचूर्णं अपामार्गचूर्णम्, वृषदण्डदर्व्या वासकस्यार्द्र- काण्डमेव दर्वी तया ॥ २४-२८ ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसक को कड़ाही में रख उसको चूल्हे पर रखकर तेज अग्नि से सीसक को पिघलायें । जब कड़ाही में सीसा पिघल जाय तो उसमें समभाग अपामार्गचूर्ण और समभाग शुष्क वासा (अडूसा) चूर्ण थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायें और अडूसे की गीली लकड़ी की करछी से चलाते जायें। जब अपामार्गचूर्ण तथा वासाचूर्ण प्रक्षेप के साथ चलाते हुए सीसे की भस्म हो जाय तो उसे उतार ठंडा करके भस्म को निकाल लें और स्वच्छ जल से क्षारांश रहित होने तक अच्छी तरह धो लें । अब इस धुले और शुष्क सीसक चूर्ण में समभाग शुद्ध मैनसिल मिलाकर अडूसे के स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें और सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस विधि को तीन बार दुहराने से सीसक की श्लक्ष्ण विशद और कज्जलसदृश भस्म हो जाती है। इसके सेवन से पक्षाघात आदि नागदोष उत्पन्न नहीं होने पाते हैं। यदि इस भस्म को चिरकाल तक भी सेवन किया जाय तो भी कोई विकार नहीं होने पाता है । अतः इसे निःशंक होकर व्यवहार में लाना चाहिये ॥ २४-२८ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः नागं विशुद्धं तु निधाय दर्व्यां प्रद्रावयेत्तीव्रतरानलेन । द्रुतं समालोक्य भिषग्वरेण्यः पादांशमीशं द्रुमेतव दद्याद् ॥ २६ ॥ द्रुतन्तु भूमाववतार्य खल्वे सम्पेपयेत्सत्वरमेव यत्नात् । प्रक्षाल्य साम्लेन जलेन नूनं बिशोष्य नीरं विदधीत चूर्णम् ॥ ३० ॥ निक्षिप्य सीसाद् द्विगुणन्तु गन्धं सम्पेपयेद्यामयुगं प्रयत्नात् । विलोक्य चूर्णं खलु कज्जलाभं निधापयेद्वैद्यवरः शरावे ॥ ३१ ॥