रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 489, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशस्तरङ्गः ४६३ षष्ठो मारणप्रकारः नागं कटाहनिहितं द्रावयेद् वह्नियोगतः । ततः शुद्धशिलाचूर्णं स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥ ३७ ॥ समांशेन तु निक्षिप्य लोहदर्ज्या प्रचालयेत् । नागभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥ ३८ ॥ ततः सीसोन्मितां शुद्धां शिलां दत्त्वा भिषग्वरः । रविदुग्धेन सम्पेष्य पुटयेदृतियत्नतः ॥ ३९ ॥ एवं नातिचिरादेव नागकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं नागकन्तु सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ ४० ॥ षष्ठः प्रकारः—शिलार्कदुग्धाभ्यां निर्माणोयः समानः पूर्वेण ॥ ३७–४० ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसे को कड़ाही में डालकर अग्निताप से पिघलायें, जब सीसा पिघल जाय तो उसमें समभाग शुद्ध मैनसिलचूर्ण थोड़ा-थोड़ा करके तब तक डालें और लोहे की करछी से चलाते जायँ जबतक कि सीसे की भस्म (राख) न हो जाय । अब इस भस्म को कड़ाही से निकाल खरल में डालकर उसमें समभाग शुद्ध मैनसिलचूर्ण मिला लें और आक के दूध के साथ मर्दन करें । जब भस्म धूप में सूखकर चूर्ण रूप में हो जाय तो उसे शरावसम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देवें । इस विधि से बहुत शीघ्र ही सीसे की भस्म हो जाती है । इस विधि से बनायी नागभस्म को सब योगों में काम में ला सकते हैं ॥ ३७–४० ॥ सप्तमो मारणप्रकारः सीसकं द्रावयेत्सत्कटाहस्थितं विद्रुतं वीक्ष्य वै वैद्यविचक्षणः । निक्षिपेच्चूर्णितं शुद्धसौगन्धिकं सीसकं सर्वथा याति यावन्मृतिम् ॥४१॥ वीक्ष्य सम्यङ् मृतं सीसकं कोविदः स्वाङ्गशीते सति त्वाददीत द्रुतम् । सीसमेवं मृतं वीतशङ्को भिषग्योजयेत्सर्वथा बाह्ययोगेऽनिशम् ॥४२॥ सप्तमः प्रकारः केवलगन्धकलेपसाध्यो भक्षणयोग्यो मनःशिलादिप्रयोगसह- योगाभावात्, अत उक्तं बाह्ययोगे इति । यथा बाह्यप्रयोगे प्रयुज्यते विदरेऽर्शःसु च नवनीतेन सह ॥ ४२ ॥ भा.टी.—शुद्ध सीसे को लोहे की कड़ाही में डालकर अग्नि पर तपायें । जब सीसा पीघल जाय तो उसमें थोड़ा-थोड़ा करके शुद्ध गन्धक का चूर्ण तब तक