भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४६४ रसतरङ्गिणी डालें और लोहे की चम्मच से चलाते जायें जब तक कि सीसक भस्म न हो जाय। अच्छी तरह सीसक भस्म हो जाने पर इसको स्वांगशीत करके भस्म को निकालें। इस विधि से बनी हुई सीसभस्म को बाह्यप्रयोग में काम ला सकते हैं ॥ अथ मृतसीसकस्य गुणाः मृतन्तु सीसं मधुरञ्च तिक्तं स्निग्धं तथोष्णं गुरु लेखनञ्च। सरं तथा वह्निविवर्द्धनञ्च रसागमज्ञैः खलु सम्प्रदिष्टम् ॥ ४३ ॥ अपि च— प्रमेहकरिकेशरी पवनरोगकालानलः। ग्रहयतिनिशारुणः खलु गुदाङ्कुरेभाङ्कुशः। बलासगदतस्करो व्रणगणौकसङ्कर्षणः परं विजयतेतरां गदहरो भुजङ्गो मृतः ॥ ४४ ॥ अपि च— नागस्तु नागसमतां द्रुतमातनोति गुल्मद्विपं दलयतीह चिरप्रमत्तम्। घोरं हरेत्प्रदरमाशु हि रक्तपूर्व्वं तूर्णन्तु रोगनिवहान् विनिहन्ति नूनम् ॥४५॥ मृतनागगुणा—उष्णमिति यद्यपि तन्त्रान्तरीयाः सीसकं स्पर्शशीतमालोक्य शीतवीर्यमाहुः यद्यपि च वङ्गस्येवास्यापि क्षारयोगात् शैत्यं गन्धादियोगादौष्ण्यं संभवति, तथापि मनःशिलादियोगाभावेन सिद्धस्य नागस्य भक्षणायोगात् शीतता- ऽनुपयोगादुष्णत्वमेवास्योक्तमाचार्यदेशीयैः, अपि च प्राचीनपरिभाषास्वपि नाग- स्यांष्णता प्रतिज्ञातेति। प्रमेहकरिकेसरीत्यादिना रूपकेण प्रमेहरोगदिविनाशो मृतनागेन विशेषत उक्तः। नागसमतां हस्तितुल्यबलताम्, रक्तपूर्व्वं प्रदरं रक्त- प्रदरम्, तूर्णं शीघ्रं, रोगनिवहान् रोगसङ्घान्। नूनम् निश्चयेन ॥ ४३–४५ ॥ भा. टी.—उत्तम विधि से बनायी हुई सीसे की भस्म मधुर और तिक्तरस, स्निग्ध उष्ण, गुरु तथा लेखन गुण युक्त होती है। यह आंतों की प्रेरक गति को बढ़ाती है और अग्निवर्धक होती है। सीसे की भस्म प्रमेहरूपी हाथी के लिए शेर के सामन घातक है, वातिक रोगों की संहारक है। संग्रहणीरूपी घोर रात्रि के लिए सूर्य के समान, और बवासीर के मस्से रूपी हाथी को वश में करने के लिए अंकुश है। कफप्रकोपजन्य रोगों को नष्ट करती है और शरीर में होनेवाले विविध