भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३० एकोनविंशस्तरङ्गः ४६५ प्रकार के व्रणों को मिटाने में अद्वितीय औषधि है । शास्त्रों में लिखा है कि सीसे की भस्म शरीर में नाग ( हाथी ) के समान बल उत्पन्न करती है और पुरातन गुल्मरोगरूपी हाथी को नष्ट करती है । इसके प्रयोग से भयंकर रक्तप्रदर का रोगी शीघ्र ही अच्छा हो जाता है । इस तरह यह भस्म सभी रोगों को शीघ्र ही नष्ट करती है ॥ ४३-४५ ॥ वक्तव्य—मुख्यतः सीसकभस्म अन्तःप्रयोग में शरीर से होनेवाले मूत्र, रक्त, स्वेद आदि स्रावों को कम करती है । अतएव नागभस्म प्रमेह की उत्तम औषधि मानी जाती है । सम्भवतः वृक्कों के लिए बल्य होने के कारण नाग- भस्म में यह गुण पाया जाता है । नाड़ीसंस्थान के लिये भी नाग उत्तम बल्य होता है, क्योंकि यह नाड़ी संस्थान, वृक्क, यकृत् और अस्थियों में सञ्चित पाया जाता है । सम्भवतः इन अंगों पर नाग का बल्य प्रभाव होता है । इसके सेवन से ग्रहणी की धारणात्मक शक्ति बढ़ जाती है, अतः नागभस्म पुरातन अती- सार और संग्रहणी में अत्यन्त लाभदायक होती है । श्वास्रोग, आमवात आदि श्लैष्मिक रोगों में इसका श्लेष्महर प्रभाव होता है । आँतों की शोथ दूर करने के लिए यह मुख्य औषधि मानी जाती है, क्योंकि आन्त्रशोथ, ग्रन्थि आदि रोगों में श्लेष्मसञ्चय मुख्य कारण होता है । यह संस्थान ( आँतों ) के लिए बल्य होने से वहाँ पर सञ्चित होनेवाले दोष को मिटा देती है । वंग की अपेक्षा उत्तम जीवाणुहर विशेषतः आन्त्रिक रोग जीवाणुहर होने से यह आन्त्रक्षय में विशेष लाभदायक होती है । गर्भाशय आदि अंगों पर भी नागभस्म का ग्राही प्रभाव होता है जिससे वहाँ से होनेवाला रक्तस्राव, व्रणस्राव और शोथस्राव सूख जाता है और उसके रोगकारक जीवाणु भी नष्ट हो जाते हैं । यह ग्राही होने के कारण आमाशयविस्तृति तथा तज्जन्य अम्लपित्त में भी विशेष लाभ- कारी सिद्ध होती है । कण्ठमाला तथा अपची आदि की ग्रन्थियों को संकुचित करने के कारण यह इन रोगों में बहुधा प्रयुक्त होती है । आन्त्रशूल, विशेषतः रंग के कारखाने में काम करनेवालों के उदरशूल में यह उत्तम गुण रखती है । मधुमेह की अन्तिम अवस्था में होनेवाली मूर्च्छा के लिये यह उत्तम औषधि मानी जाती है । निष्क्रमण—नाग का निष्क्रमण मूत्र, पित्त, स्वेद, स्तन्य (छाती का दूध) और आँतों में से मल के द्वारा होता है । अतः इन अवयवों पर इसका ग्राही प्रभाव होता है ।