रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७० रस्तरङ्गिणी पेपर ) से छान लें। अब इस छने हुए जल को एक काँच पात्र में डालकर पुनः अग्नि पर पकायें। जब कुछ जलांश शेष रहे तो पात्र को नीचे उतार ठंडा होने को रख दें। पात्र के शीतल होने पर पात्र के तल प्रदेश में जमे हुए सीसक सिरकित् के चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण के छोटे-छोटे कणों (Cristals) को एकत्र कर लें। यह सीसक सिरकित् बनाने की विधि है॥६५-७१॥ वक्तव्य—उक्त विधि से बनाया हुआ सीसक सिरकित् मधुररस और ग्राही चूर्ण होता है जो ढाई गुने जल में घुल जाता है। इसकी मात्रा १ ग्रेन ( ३/४ रत्ती ) से ५ ग्रेन तक होती है। अथ आरनालीयसीसकद्रवस्य निर्माणप्रकारः आरनालीयसीसकंतु निर्मलं शरभागिकम् । सार्द्धत्रिभागकञ्चैव शुद्धं मृद्दारशृङ्गकम् ॥ ७२ ॥ परिस्रुतञ्च विमलं जलं विंशतिभागिकम् । सम्मेल्य काचपात्रे च चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ ७३ ॥ पचेन्मन्दाग्निना तावत् यावदेति द्रुतिं पराम् । यावज्जलं प्रशुष्येत द्रुतिपर्यन्तमग्निना ॥ ७४ ॥ विनिक्षिपेज्जलं तावद्रसतन्त्रविचक्षणः । काचकूप्यां निधायाथ भिषग्रत्नः प्रयोजयेत् ॥ ७५ ॥ अथारनालीयसीसकद्रवस्य निर्माणम्—आरनालीयक इत्यत्र “अल्पार्थे कन्” इत्यल्पार्थे कन्–प्रत्ययो विहितः। तेनांग्लभाषाप्रसिद्ध “Sub” इत्युपसर्गप्रत्या- यक इत्यवनेयम् । आरनालीयसीसं पूर्वोक्तसाधनं पञ्चभागिकम्, मृद्दारशृंगं जलधौतपिष्टं शुद्धं सार्धत्रिभागिकम्, परिस्रुतजलस्य २० भागाः। मन्दाग्नौ द्राव- येत् । द्रुतौ सत्यां परिस्रुतजलस्य यावानंशो वह्निना शुष्कस्तावदेवान्यत् जलं तत्र द्रुतौ क्षेप्यम् इत्याशयः ततः काचकूप्यां निधानमिति ॥ ७२–७५ ॥ भा.टी.—आरनालीय सीसक चूर्ण पाँच भाग, शुद्ध मुरदासँग साढ़े तीन भाग, शुद्धपरिस्रुत जल बीस भाग लेकर सब को एक कांचपात्र में मिला चूल्हे पर रखें और मन्द-मन्द अग्नि से मुरदासँग के घुलने तक पकायें । मुरदासँग के जल में घुलने में जितना जल सूख जाय उतना शुद्ध परिस्रुत जल उसमें फिर मिला दें। और नीचे उतारकर इस द्रव को एक कांच की शीशी में रख लें । इसको Sublead acitate lotion कहते हैं ॥ ७२–७५ ॥