रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर, अत्यन्त पतला जल के समान स्राववाले, दाहयुक्त और पीत्रवाले व्रणों को धोने के लिए इस द्रव को काम में लाया जाता है । यदि सुजाक के कारण मूत्रे- न्द्रिय में व्रण से स्राव होता हो तो उत्तरवस्ति विधान से इस द्रव में सातगुणा जल मिलाकर पिचकारी देनी चाहिये । वीसर्परोग की त्वचा के शोथ, अभिघात- जन्य शोथ, अस्थियों में रगड़े लगने या बुरी तरह दब जाने से होनेवाले शोथ और व्रणों में साठ बूँद सजल आरनालीयक सीसकद्रव में दो रत्ती अफीम और पाँच तोला शुद्ध जल मिलाकर व्रणों और शोथ को धोने के काम लाया जाता है । इस अहिफेनयुक्त आरनालीय सजल सीसकद्रव से धोने पर अभिघातजन्य दाह और कण्डू तथा योनि प्रदेश और गुद प्रदेश में होनेवाली कण्डू में शीघ्र आराम आता है । फिरंग रोग के उपद्रव स्वरूप उत्पन्न होनेवाले निरुद्धप्रकश- रोग में उक्त सीसकद्रव को काचवस्ति द्वारा मणि (शिश्नमुण्ड) और शिश्न के अग्र चर्म में प्रवेश करने से शोथ दाह तथा अत्यन्त पीड़ा में शीघ्र ही आराम आता है ॥ ८३-६१ ॥ अस्य प्रयोगनिषेधः अक्ष्णोर्नाञ्जीत मतिमान् खलु द्रवमिमं भिषग् । अञ्जनेन भवेदान्ध्यं व्रणशुक्रमथापि वा ॥ ६२ ॥ अस्य च द्रवस्य भ्रान्त्यापि चक्षुषोर्नोपयोग इत्याह-अक्ष्णोर्नाञ्जीतेति ॥६२॥ भा.टी.-उक्त सजल आरनालीयक सीसकद्रव को नेत्रों के व्रणों में कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये, अन्यथा इससे आँखें अंधी हो जायेंगी अथवा उनमें व्रणशुक्र हो जायेगा ॥ ६२ ॥ अथ अशुद्धामृतसीसकसेवनविकृतौ विधानम् अविशुद्धामृताह्वोत्थविकारपरिशान्तये । विशुद्धगन्धं चूर्णन्तु योजयेद् भिषजां वरः ॥ ६३ ॥ अशुद्धसीसकभक्षणदोषश्च शुद्धगन्धकसेवनादपनेयः ॥ ६३ ॥ भा.टी.-अशुद्ध और ठीक विधि से भस्म न किये गये नाग के सेवन से उत्पन्न विकारों को शान्त करने के लिए कुछ दिन शुद्धगन्धक का सेवन करना चाहिये ॥६३ अथ यशदस्य नामानि यशदं यसदश्चैव जशदं जसद्ं तथा । रीतिहेतुः खर्परजं समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ६४ ॥ भा.टी.-यशद, यसद, जशद, जसद्, रीतिहेतु, खर्परज, ये सब नाम जस्त ( Zinc ) के हैं ॥ ६४ ॥