रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशस्तरङ्गः ४७७ द्वितीयो मारणप्रकारः [ गीतिका ] यशदं विशुद्धमादौ विनिधाय वै कटाहे । अतितीव्रवह्नियोगात् खलु गालयेन्निकामम् ॥ १०८ ॥ दृढनिम्बदण्डदर्व्या परिचालयेत्प्रयत्नात् । सुमृतं ततो विलोक्य त्ववतारयेत्कटाहम् ॥ १०९ ॥ विमलं प्रदाय तालं चरणांशिकं रसज्ञः । खलु पेषयेत्प्रयत्नात् पुटवित् पुटेत् पुटस्थम् ॥ ११० ॥ रीत्यानया तु यशदं मृतिमेति निर्विशेषाम् । विविधानुपानयोगात् वितरेत्तु वीतशङ्कः ॥ १११ ॥ द्वितीयः प्रकारः तालकयोगसाध्यो निगदव्याख्यातश्च ॥ १०८-१११ ॥ भा.टी.—शुद्ध यशद को लोहे की कड़ाही में डाल चूल्हे पर रखकर अत्यन्त तेज अग्नि से अच्छी तरह पिघलायें और एक मजबूत कच्चे नीम के दण्डे से तब तक रगड़ते जायें और पकाते जायँ जब तक कि यशद की भस्म न हो जाय । जब भस्म हो जाय तो कड़ाही को नीचे उतार भस्म को खरल में डालें और उसमें यशद से चतुर्थांश शुद्ध हरतालचूर्ण मिला खूब घोट करके एक शरावसम्पुट में बन्द करके धूप में सुखा लें । अच्छी तरह पुट के सूखने पर इसे पुट में फूँक दें । इस विधि से यशद की उत्तमभस्म हो जाती है । इसको विविध अनुपान योग से निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥ १०८-१११ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः यशदं विमलं न्यस्य कटाहे गालयेद्भिषक् । अपामार्गस्य चूर्णञ्च स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥ ११२ ॥ विनिक्षिपेत् भिषग्वर्यो लोहदर्व्याथ चालयेत् । भस्म यावद् भवेत्सम्यक् चूर्णं तावत् समापयेत् ॥ ११३ ॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ज्वलदङ्गारवर्णं स्याद्यशदं तु यथा चिरम् ॥ ११४ ॥ तथा प्रदीपयेदग्निं दिनमेकं भिषक्तमः । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा यशदं मृतमाहरेत् ॥ ११५ ॥ तृतीयः प्रकारस्त्वपामार्गचूर्णक्षेपसाध्यो वंगस्येवाल्पव्ययो बहुफलश्चेति॥११२॥ भा.टी.--शुद्ध यशद को लोहे की कड़ाही में डालकर उसको आग पर