भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४७८ रसतरङ्गिणी रख गरम करें। जब यशद पिघल जाय तो उसमें थोड़ा-थोड़ा करके अपामार्ग का चूर्ण तब तक डालते जायँ और लोहे की करछी से चलाते जायँ जब तक कि यशद की अच्छी तरह से भस्म न हो जाय। अच्छी तरह भस्म होने पर इसको कड़ाही के बीच में एकत्र करके एक मिट्टी के सिकोरे से अच्छी तरह ढक दें। और कड़ाही के नीचे अति तीव्र आग देते जायँ। जब देखें कि शराव से ढकी हुई भस्म जलते हुए अंगारों के समान लाल हो गयी है तो अग्नि देना बन्द कर दें। इस तरह एक दिन भर अग्नि देने के बाद स्वतःशीत यशद्भस्म को कड़ाही से निकाल लें ॥ ११२-११५ ॥ वक्तव्य--यद्यपि उक्त मारण प्रकार में भस्म को क्षारशून्य करने का कोई उल्लेख नहीं है, तथापि वंग या नाग की भाँति इसको क्षारशून्य कर लेना चाहिये। अन्यथा इसको बाह्यप्रयोग में काम लाना चाहिये। चतुर्थो मारणप्रकारः कटाहसंस्थं यशदं विमलन्तु शनैः शनैः। विघट्टयँल्लोहदर्य्या पचेत्तीव्राग्निना भिषक् ॥ ११६ ॥ यशदं चूर्णतां यातं वस्त्रपूतन्तु कारयेत् । स्थूलांशञ्च पुनः कामं कटाहस्थं विपाचयेत् ॥ ११७॥ एवं नातिचिरादेव यशदं मृतिमाप्नुयात् । कुन्देन्दुधवलं भस्म जायते चातिशोभनम् ॥ ११८ ॥ रीत्यानया खलु मृतं यशदन्तु विधानतः । नावनाञ्जनकार्यादौ योजयेद्भिषजां वरः ॥ ११९ ॥ चतुर्थः प्रकारः केवलं बाह्यप्रयोगयोग्यो भक्षणायऽनुपयुक्तः। अत्र अति- तीव्राग्निना यशदं पाच्यमित्यवधेयम् ॥ ११६-११९ ॥ भा. टी.-एक लोहे की कड़ाही में शुद्ध यशद डालकर उसको चूल्हे की अग्नि पर रखें और तीव्र अग्नि देते हुए पिघलायें। पिघलाने पर इसको केवल लोहे की चम्मच से चलाते जायँ और तीव्र अग्नि देते जायँ। जब यशद का चूर्ण बन जाय तो उसे नीचे उतार ठंडा करके कपड़े में छान लें। छानने में जो यशद के मोटे-मोटे कण रह जायँ उनको पुनः कड़ाही में डाल तीव्र अग्नि से पकायें। फिर ठंडा करके कपड़े से छान लें। इस तरह यशद की चाँदनी- पुष्प या चन्द्रमा के समान श्वेत उत्तम भस्म हो जाती है। इसी विधि से बनायी हुई यशद की भस्म को नस्य तथा अञ्जन आदि बाह्य प्रयोग में काम लायें ॥ ११६-११९ ॥