रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशस्तरङ्गः ४७६ अथ सुमृतयशदस्य गुणाः यशदं तुवरं शिशिरं कटुकं परमं नयनामयनाशकरम् । कफपित्तसमुत्थितरोगहरं बलवीर्यविवेकसमृद्धिकरम् ॥१२०॥ यशदं पाण्डुशमनं बहुमेहनिषूदनम् । कासश्वासप्रशमनं निशास्वेदनिबर्हणम् ॥ १२१ ॥ यशदं परमं श्लेष्मकलासंकोचकृन्मतम् । समाख्यातं विशेषेण व्रणस्रावरोधनम् ॥ १२२ ॥ श्रमावसादशमनं रजःस्रावनिषूदनम् । कम्पवातपहं चैव विशेषात्परिकीर्तितम् ॥ १२३ ॥ मृतयशदगुणाः—यशदं शीतलम् । प्राञ्चोऽप्याहुः—"यशदं तुवरं तिक्तं शीतलं कफपित्तनुत् । चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासञ्च नाशयेत् ॥” इति । बहुविधो मेहो बहुमेहस्तस्य बहुमेहस्य नाशकम्, निशास्वेदनिबर्हणमित्यारभ्य गुणानां नवानुभवः । श्लेष्मकलासंकोचनं नस्यद्वारा वक्ष्यति हि 'नासिकाश्लैष्मि- ककलादौर्बल्यं विनिहन्त्यलम् ।' इति ॥ १२०-१२३ ॥ भा.टी.—उत्तम प्रकार से बनायी हुई यशद की भस्म कषाय और कटुरस, और शीत गुण युक्त होती है । बाह्य प्रयोग में यह नेत्ररोग को नष्ट करती है । इसके अन्तःप्रयोग कफपित्तप्रकोपजन्य रोग नष्ट होते हैं और शरीर में बल वीर्य तथा बुद्धि की वृद्धि होती है। यशदभस्म पाण्डुरोगशामक, बहुमूत्ररोगनाशक, कास श्वासरोगशामक, राजयक्ष्मा या जीर्णज्वर में होनेवाले रात्रिस्वेद को दूर करती है। इसके अतिरिक्त यशदभस्म उत्तम श्लैष्मिककलासंकोचक और विशेष रूप में व्रणस्रावरोधक है। अति-परिश्रमजन्य थकावट को मिटाती है और ऋतुकाल में अधिक मात्रा में होनेवाले मासिकस्राव को नियमित करती है । इसके सेवन से हाथ-पैरों में होनेवाला कम्पवात रोग दूर हो जाता है ॥१२०-१२३॥ यशदस्य विशिष्टो गुणः संशीलितं वै यशदं मृतन्तु विनाशयेदाशु भृशं विशेषात् । प्रसादसंज्ञं पवनं प्रवृद्धमेकाङ्गगं वै सकलाङ्गगं वा ॥ १२४ ॥ भा.टी.—उत्तम प्रकार से बनी हुई यशद की भस्म सेवन करने से शीघ्र ही एकांग अथवा सर्वांग में प्रकुपित प्रसाद संज्ञक वायु का शमन हो जाता है । अर्थात् यह उत्तम वातशामक द्रव्य है ॥ १२ ॥ वक्तव्य—यशदभस्म बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में स्रावशोषक और ग्राही होती