रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशस्तरङ्गः ४६१ ग्राह्यतीक्ष्णलोहस्य लक्षणम् उज्ज्वलं लोहफलकं धात्रीकाशीसलेपितम् । गिरिशृङ्गांकितं यत्स्यात्तीक्ष्णलोहं तदुत्तमम् ॥ ८ ॥ उज्ज्वलमित्यादि ग्राह्यतीक्ष्णलोहलक्षणम् । प्राञ्चस्तु-“कासीसामलकल्काक्ते- लोहेऽङ्गं दृश्यते स्फुटम् । तीक्ष्णलोहं तदुद्दिष्टम्” इत्याहुः । “क्ष्माभृच्छिखराका रायद्यङ्गान्याम्लेन लेपिते। लोहे स्युर्यत्र सूक्ष्माणि तत्सारममिश्रीयते ।।”इति च॥८॥ भा. टी.-जिस लोह के फलक (चौड़े पत्र ) में आंवला और कसीस का लेप कर देने से उसमें कुछ देर बाद पर्वत के शिखराकार उभार से उठ आयें तो उक्त लोह को तीक्ष्ण लोह कहा जाता है ॥ ८ ॥ कान्तलोहस्य लक्षणम् कान्तपाषाणजं लोहं कान्तलोहं प्रकीर्तितम् । आध्मातकान्तपाषाणसत्त्वभूतं तु तन्मतम् ॥ ६ ॥ कान्तलोहन्तु आध्मातकान्तपाषाणसत्त्वभूतमेवेति तत्परिचयः केवलमुक्तः । यद्यपि च प्राचीनतन्त्रेषु तत्र तत्र “यत्पात्रे न प्रसरति जले तैलबिन्दुर्निक्षिप्तो हिंगुर्गन्धं त्यजति च निजां तिक्ततां निम्बकल्कः । तप्तं दुग्धं भवति शिखरा कारकं नैति भूमिं कृष्णाङ्गः स्यात् सजलचणकः कान्तलोहं तदुक्तम् ॥” इति कान्तलोहलक्षणमुक्तम् । तथापि एतलक्षणलक्षितलोहस्यानुपलभ्यत्वात् उपल- भ्यमानकान्तपाषाणसत्त्वभूतं च लोहे उक्तलक्षणानुपलम्भात् यथाप्राप्तं तत्त्वस्व- रूपमात्रमुक्तमिति विचित्रं लक्षणं नोपश्लोकितमाचार्यैरित्यवधेयम् ॥६॥ भा.टी.-कान्तपाषाण को तपाने से प्राप्त होनेवाले सत्त्वस्वरूप लोह को कान्तलोह कहा जाता है ॥ ६ ॥ वक्तव्य--आगे लिखे जानेवाले प्राचीन मत से कान्तलोह के लक्षणों से युक्त लोह आज तक कहीं भी प्राप्त नहीं हो सका है । साथ ही यहाँ पर कान्त, पाषाणसत्वरूप कान्तलोह में भी प्राचीनमत के लक्षण नहीं मिलते हैं । इसी कारण से यहाँ अपना विचार दिखाकर इस वाद-विवाद को छोड़ दिया है। और प्राचीन मत भी कान्तलोह के विषय में दिखा दिया है कि कोई अन्वेषक इस तरह यदि खोज करना चाहे तो इस प्रकार कर सकता है । जिस लोह के पात्र में भरे हुए जल में तेल बूँद डालने से वह न फैले, और उस लोहपात्र में यदि नीम के पत्तों को पीस कर लेप कर दिया जाय तो उसमें कड़वापन न रहे। इसी तरह इस लोहपात्र में स्वच्छ चनों को जल के