भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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१० रसतस्रङ्गिणी परीक्षोपयोगि रसशास्त्राचार्य्यस्वरूपमाह सदाचार इत्यादिना--सदाचारादयो गुणाः प्रभावत्त्वार्थं व्यवहारशुद्ध्यर्थञ्च, सिद्धमन्त्रः == आप्तमन्त्रसिद्धिः । रसत- न्त्रस्वतन्त्रः स्वतन्त्रप्रज्ञः नवनवरसतन्त्रनिर्माणकुशलः ॥३३, ३४॥ आ.टी.---रसशास्त्र को पढ़ानेवाला तथा क्रियात्मक ज्ञान करानेवाला आचार्य (गुरु) सदाचारी, सच्चरित्र, पक्षपातरहित,सद्भावयुक्त,सत्यवक्ता, मन्त्र- सिद्ध किया हुआ, शिव का परमभक्त, धैर्यवान् , बलवान् , स्थिरविचारवाला, पारद की जारणा-मारणादि क्रिया में अत्यन्त चतुर, विज्ञान विचार और अनुभव द्वारा नूतनरसशास्त्र रचने में भी प्रवीण श्रेष्ठ आचार्य कहा जाता है॥३३,३४॥ शिष्यस्य स्वरूपम् सदाशयः सदाचारः स्वकुलाचारदीक्षितः । गुरुपूजारतो वीरः सत्यवादी दृढव्रतः ॥३५॥ आज्ञापरो निरालस्यो कुलीनोऽतिविचक्षणः । आयुर्वेदकृताभ्यासः शिष्यः खलु प्रशस्यते ॥३६॥ सदाशयादयः शिष्यगुणाः शिष्यादृढताव्यवहाररक्षार्थाः। दृढव्रतः प्रतिज्ञा- पालकोऽतिविचक्षण ऊहापोहकुशलः ॥ ३५, ३६ ॥ आ.टी.---रसशास्त्र पढ़नेवाला शिष्य शुद्ध भाववाला, सदाचारी, अपने कुलाचार को जाननेवाला, गुरुपूजक, बलवान् , सत्यवक्ता, प्रतिज्ञा को पूरा करनेवाला, आज्ञापालक, निरालसी, कुलीन, अत्यन्त समझदार और रस- शास्त्र के अतिरिक्त आयुर्वेद का विद्वान् होना चाहिए ॥ ३५, ३६ ॥ शिष्योपनयने वर्जनीयाः दुराचारा दुश्चरिता अकुलीना महोद्धताः । चौर्यच्छलादिना नित्यं विद्याग्रहणलोलुपाः ॥३७॥ अज्ञातकुलशीला ये नास्तिका गुरुनिन्दकाः । शिष्योपनयने हेया नरा रसविशारदैः ॥३८॥ इति रसशालाविज्ञानीयो नाम प्रथमस्तरङ्गः । दुराचारादयः शिष्यदोषास्त्यागार्थाः, नास्तिकाः---“नास्तिको वर्ज्याना- मिति” चरकस्मरणात् , शिष्योपनयने शिष्यतास्वीकारकम्मैणि हेयाः वर्जनीयाः ॥ ३७, ३८ ॥ आ.टी.-रसशास्त्र के अध्यापक को दुराचारी, दुश्चरित्र, नीचकुलोत्पन्न, नम्रतारहित, चोरी और छल से विद्या ग्रहण करनेवाला, जिसके स्वभाव और