रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ रसतरङ्गिणी वराक्वाथेन सुपचेदतिवेलं खराग्निना । शोषयेत्सलिलं यत्नात् लौहकर्मविचक्षणः ॥ २७ ॥ स्थालीपाके त्रिगुणिता वरा, षोडशिकं जलम् । अष्टभागावशिष्टञ्च क्वाथमानं विधीयते ॥ २८ ॥ शतमूलीभृङ्गराजहस्तिकर्णशिफोत्थितैः । रसैः समैर्वापि भिषक् स्थालीपाकं समाचरेत् ॥ २९ ॥ यथादोषौषधेनापि स्वरसं वा कषायकम् । आदाय क्वाथमानज्ञः स्थालीपाकं समाचरेत ॥ ३० ॥ भा.टी.—त्रिफलाकषाय के अतिरिक्त लौहचूर्ण को शताबार, भृंगराज, हस्तिकर्ण, पलास की मूल के स्वरस लौहचूर्ण के बराबर भाग में लेकर इनके साथ भी स्यालोपाक किया जाता है। इसके अतिरिक्त जिस दोष, (वात, पित्त अथवा कफ ) को विशेष रूप से शान्त करने के अभिप्राय से लोहभस्म बनानी हो उस दोष की शामक औषधि के स्वरस अथवा कषाय के साथ भी लोह का स्थालीपाक किया जा सकता है ॥ २६–३० ॥ पुटपाकस्य स्वरूपम् रसादिभिर्भेषजानां खल्वे लौहं विमर्दितम् । पुटस्थं पच्यते यस्मात् पुटपाकस्ततः स्मृतः ॥ ३१ ॥ भा.टी.—स्थालीपाक करने के उपरान्त लोहचूर्ण को (लोहे के) खरल में डालकर उसमें विभिन्न औषधियों का स्वरस, कपाय मिलाकर खूब मर्दन करके सुखा लें और एक सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देने को पुटपाक विधान कहते हैं ॥ ३१ ॥ पुटपाकविधानम् स्थालीपाकविपक्वन्तु लोहं प्रक्षालयेत्ततः । यथादोषौषधोत्थेन रसेन क्वथितेन वा ॥ ३२ ॥ लोहखल्वे सुसम्पेष्य चक्रिकाः कारयेत्ततः । आतपे खलु संशोष्य मृच्छरावे तु विन्यसेत् ॥ ३३ ॥ शरावेण विधायथ दृढसन्धि प्रलेपयेत् । वनानीतैः करीषैर्वा ह्युत्पलैर्हस्तपिण्डदैः ॥ ३४ ॥ पुटेद् गजपुटेनेह पुटपाकक्रियापटुः । स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा सम्पुटन्तु समाहरेत् ॥ ३५ ॥