भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३२ विंशस्तरङ्गः ४६७ शोषयेद्भिषजां वर्यः कुर्यादेवं तु सप्तधा ॥ २३ ॥ भानुपाके लौहतुल्या त्रिफला द्विगुणं जलम् । पादावशेषितक्वाथं वराक्वाथं प्रयोजयेत् ॥ २४ ॥ सोऽयं भानुपाकप्रक्रियाभेदो नागार्जुनादिसंमतः साम्प्रतमप्रचलितोऽपि गुणबहुलतयाऽऽदृत आचार्यैः ॥ २२-२४ ॥ भा.टी.—शुद्धलोहचूर्णं को लेकर पहिले उसे जल से अच्छी तरह धो लें। अब इस लोहचूर्णं में त्रिफलाकषाय मिलाकर किसी खरल में डालकर धूप में रख दें। जब त्रिफलाकषाय धूप से सूख जाय तो उसमें पुनः त्रिफलाकषाय डाल दें। इस विधि को सात बार दुहराने से लौह का भानुपाक हो जाता है। भानुपाक करने के लिये त्रिफलाकषाय बनाना हो तो लौह के समभाग त्रिफला लेकर उसमें द्विगुण जल डालकर पकायें, जब चतुर्थांश जल शेष रह जाय तो उसे छानकर लोह में डालकर धूप में रख दें ॥ २२–२४ ॥ स्थालीपाकस्य लक्षणम् त्रिफलाक्वथितोपेतं लौहं स्थाल्यां खराग्निना । शुष्यन् विपच्यते यस्मात् स्थालीपाकस्ततः स्मृतः ॥ २५ ॥ भा.टी.—लौहचूर्णं का उक्त विधान से सात बार भानुपाक करने पर उसे फिर त्रिफलाकषाय के साथ एक स्थाली (पतेली, लोहे की कड़ाही) में अतितीव्र अग्नि से पकाते हुए जल को सुखा लेने को स्थालीपाक कहा जाता है ॥२५॥ वक्तव्य—उक्त विधि से अच्छी तरह लौह का भानुपाक करके उसे जल से खूब अच्छी तरह धोकर साफ करलें। अब इस लोह को एक (लोहे के) पात्र में डालकर इसमें त्रिफलाक्वाथ मिलाकर चूल्हे पर अति तीव्र अग्नि से पकायें। जब त्रिफलाजल सूख जाय तो पुनः उसमें त्रिफलाजल डालकर पकायें। इस विधि से जितने त्रिफलाकषाय में उसे पकाना हो पका लें। स्थालीपाक करने के लिए त्रिफलाकषाय बनाना हो तो लोहचूर्णं से त्रिगुण त्रिफलाचूर्णं लें और इसमें त्रिफलाचूर्णं से सोलहगुना जल डालकर पकायें। जब आठवां भाग जल अवशेष रह जाय तो उसे उतारकर छान लें। इस क्वाथ में लोहचूर्णं डालकर स्थालीपाक करना चाहिए। स्थालीपाकविधानम् भानुपाकविपक्वन्तु लोहं प्रक्षालयेदलम् । ततः स्थाल्यां तु विन्यस्य चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ २६ ॥

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