रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—लोह चूर्ण को करछी में रखकर अति तीव्र अग्नि में तपाकर समभाग त्रिफलाक्वाथ और गोमूत्र को एकत्र मिला उसमें सात बार बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥१८॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः शशासृजा प्रलेपितं त्वयोऽर्कदुग्धतोऽपि वा । वराजले निषेचनाद् विशुद्धिमेत्यनुत्तमाम् ॥ १६ ॥ चतुर्थः शशरुधिरेण लेपनादर्कदुग्धलेपनाद्वा साध्यः । एतच्च कान्तलोहस्य प्रायः । उक्तं हि—“शशरक्तेन संलिप्तं किम्बार्कपयसायसम् । दलं हुताशने तप्तं सिक्तं त्रैफलवारिणि ॥ त्रिंशः कान्तस्य संशुद्धिरित्येवं परमा भवेत्” इति । यद्वा “तप्तं क्षाराम्लसंयुक्तं शशरक्तेन भावितम् । कान्तलोहं भवेच्छुद्धं सर्वदोषवि- वर्जितम् ॥” इत्याहुः । अपि च “तत्तद्व्याध्युपयुक्तानामौषधानां जलेऽयसः । प्रक्षेपं प्राह तत्त्वज्ञः सिद्धो नागार्जुनः पुरा ॥” इति रसमाधवे ॥१६॥ भा.टी.—तीक्ष्णलौह के बारीक पत्रों को लेकर उन पर खरगोश के रक्त का अथवा अर्कदुग्ध का लेप करके सुखा लें । अब इन पत्रों को अग्नि में तपा- कर त्रिफलाक्वाथ में सात बार बुझा देने से लोह शुद्ध हो जाता है ॥१६॥ अथ लौहशुद्ध्यनन्तरं तत्पाकक्रमः प्रथमं भानुपाकेन स्थालीपाकात्ततः परम् । पुटपाकेन पक्वञ्च लौहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥ २० ॥ भा.टी.—लोहचूर्ण को शुद्ध करने पर पहिले उसका भानुपाक करना चाहिये । भानुपाक के बाद स्थालीपाक और इसके बाद लोह का पुटपाक करने से लोह उत्तम रूप से भस्म हो जाता है ॥२०॥ तत्रादौ भानुपाकलक्षणम् वराक्वाथयुतं लौहं भानोः प्रखरभानुभिः । शुष्यन् विपच्यते यस्माद् भानुपाकस्ततः स्मृतः ॥ २१ ॥ भा.टी.—त्रिफला के क्वाथ के साथ लौहचूर्ण को तीव्र धूप में सुखा लेते हैं, इसलिए इसे भानुपाक कहते हैं ॥२१॥ अथ भानुपाकविधानम् विमलं खलु लौहन्तु सलिलक्षालितं भिषक् । त्रिफलाक्वाथसंयुक्तं ततः खल्वे निधापयेत् ॥ २२ ॥ निदाघे तु निधायाथ भानोः प्रखरभानुभिः ।