रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०० रसतरङ्गिणी का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंग लोह के साथ मिश्रित होकर उसमें रासायनिक परिवर्तन करता है। २-हर बार औषधि के कषाय आदि में लोहचूर्ण को खूब मर्दन किया जाता है जिससे लोह सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में विभक्त होकर इस रूप में आ जाता है। उसे अन्तःप्रयोग करने में आमाशय आदि अंगों को आत्मसात् करने में देर नहीं लगती है और शीघ्र ही शरीर में लाभ होने लगता है । इसके अतिरिक्त लोहभस्म में औषधियों के क्षारीय भाग रह जाते हैं जो यकृत् तथा आँतों से स्राव अधिक उत्पन्न करते हैं और लोह के ग्राही प्रभाव को कम कर देते हैं । पुटपाके भेषजानां परिमाणम् पुटपाके वरादीन यथादोषौषधानि तु । लोहतुल्यानि गृह्णीयात् पुटपाककलापटुः ॥३६॥ यथा यथा पुटान्यत्र दीयन्ते सुविधानतः । भवेत्तथा तथावश्यमतिवेलं गुणोदयः ॥४०॥ न चैवं जनयत्येतल्लोहजं कोष्ठबद्धताम् । खरविट्कत्वमपि वा सुचिरं त्वस्य सेवनात् ॥४१॥ भा.टी.-पुटपाक के लिए काम में आनेवाली त्रिफला अथवा दोषानुसार विदार्यादिगण, किरातादिगण अथवा शट्यादिगण, दशमूल आदि औषधियाँ लोहचूर्ण के समभाग लेनी चाहिए । उक्त त्रिफला आदि औषधियों के साथ जितने अधिक पुट लोह को दिये जायेंगे उतना ही इसमें अधिक गुणोदय होता रहेगा । अधिक पुट देने से लोहभस्म में मलबन्ध करने का दोष भी बहुत ही कम रह जाता है । यदि उक्त विधि से अनेक पुट देकर लोहभस्म बनायी गयी हो तो उसे चिरकाल तक सेवन करने से भी सूखा पाखाना नहीं होने पाता है ॥ ३६-४१ ॥ लौहमारको गणः त्रिफला शतमूली च सिंहिका तालमूलिका । नीलोत्पलञ्च ह्रीवेरं दशमूलं पुनर्नवा ॥४२॥ वृद्धदारकमूलञ्च भृङ्गं विश्वं विडङ्गकम् । करञ्जशिग्रुनिर्गुण्डीमुस्तैरण्डमूलकम् ॥४३॥ हस्तिकर्णपलाशश्च पर्पटश्चन्दनं तथा । समाख्यातो गणोऽयन्तु लोहमारकसंज्ञकः ॥४४॥ भा.टी.—हरड़, बहेड़ा, आँवला, शतावर, अडूसा, मूसली, नीलकमल (निलोफर) सुगन्धबाला, दशमूल (बेल, अरलु, गाम्भारी, पाडल और अरणी