रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी छाल, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, छोटी कटैली, बड़ी कटैली और गोखरू) पुनर्नवा, विधारे की मूल, भांगरा, सोंठ, वायविडङ्ग, करञ्ज, सहजना, सम्भालू, तुलसी और एरण्डमूलत्वक्, हस्तिकर्णपलाश (बड़े चौड़े पत्तोंवाला ढाक), पित्तपापड़ा, चन्दन, इन औषधियों के समुदाय को लोहमारकगण कहा जाता है। अर्थात् इन औषधियों के योग से लोहभस्म अपेक्षाकृत शीघ्र और अधिक गुणकारी होती है ॥ ४२–४४ ॥ अथ वातहरो गणः एरण्डमूलं रास्नाथ दशमूलं प्रसारणी । मुद्गपर्णी माषपर्णी शतमूलो पुनर्नवा ॥ ४५ ॥ अश्वगन्धामृता मांसी बला नागबला तथा । गणो वातहरोऽयन्तु वातामयहरः परम् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—एरण्ड की त्वचा, रास्ना, दशमूल, प्रसारणी, माषपर्णी, शतावर, पुनर्नवा, असगन्ध, गिलोय, जटामांसी, बला (खरेटी), नागबला (सहदेई), इन औषधियों को वातहरगण के नाम से कहा जाता है। क्योंकि इनके सेवन से वायुप्रकोपजन्य रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ४५, ४६ ॥ पित्तनाशको गणः उशीरनीरसिंहिकाकिरातभूरिपुत्रिकाः । पटोलचन्दनामृतासरोजतालमूलिकाः ॥ ४७ ॥ सुतिक्तशाल्मलीशिखासितामहीरुहामयाः । गणस्तु पित्तनाशको ह्ययं तु पित्तरोगहृत् ॥ ४८ ॥ पित्तनाशकगणः नीरं बालकम्, भूरिपुत्रिका शतावरी, सुतिक्तः, पर्पटः, महीरुहामयो लाक्षा ॥ ४७, ४८ ॥ भा.टी. – खश, सुगन्धबाला, अडूसा, चिरायता, पटोलपत्र, चन्दन, गिलोय, नील कमल, मुसली, पित्तपापड़ा, सेमर की मूसली, मिश्री और लाख, ये औषधियाँ पित्त के रोगों को नष्ट करती हैं। अतः इन औषधियों के इस समुदाय को पित्तनाशकगण नाम से कहा गया है ॥ ४७, ४८ ॥ कफनाशको गणः रास्न मरिच चविका नागिनी विश्वभेषजम् । एरण्ड. पिप्पलीमूलं तुलसी शृङ्गवेरकम् ॥ ४६ ॥ भार्गी रञ्जाककुसुमं मूर्वा शिग्रु बिभीतकम् ।