भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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विंशस्तरङ्गः ५०५ स्वरसैः पुनर्नवायाः पुटयेच्च भूरिवारम् । पुटितन्तु लोहमेवं मृतिमेति निर्विशेषांम् ॥ ७० ॥ विधिना त्वनेन यत्नाद् विहिता तु लौहभूतिः । गुदाजामयप्रणुत्यै कथिता त्वतिप्रशस्ता ॥ ७१ ॥ पञ्चमः प्रकारः—नागजिह्वः मनःशिला, कुलिशः स्नुही, अग्निमुखो भल्ला- तकः । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ६४-७१ ॥ भा.टी.—एक सेर विशुद्ध चूर्ण को लोहे के खरल में डालकर उसमें लोहचूर्ण के बराबर भाग शुद्ध मैनसिल मिला दें । अब इसको शालिमूलस्व- रस से अच्छी तरह रगड़ कर शुष्क चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार समभाग मैनसिल मिलाकर तीन गजपुट देने से लोहका अतिसूक्ष्म चूर्ण हो जाता है । इस चूर्ण को खरल में अच्छी तरह पीस कर कपड़े से छान लें । छानने में जो लोहचूर्ण के मोटे कण रह जायें उनको फिर समभाग शुद्ध मैनसिल से घोटकर गजपुट में फूँककर कपड़छान करके सूक्ष्म चूर्ण बना लें । अब इस कपड़छान किये हुए लोहचूर्ण को त्रिफ- लाक्वाथ, अदरखरस, चित्रकक्वाथ, भांगरास्वरस, हस्तिकर्णपलाशस्वरस, थूहर दुग्ध, जिमिकन्दस्वरस, भल्लातकस्वरस (क्वाथ) तथा पुर्ननवा के स्वरस में पृथक्-पृथक् घोटकर अनेक बार पुट देवें । इस प्रकार पुट देने से लोह की उत्तम भस्म हो जाती है । इस पञ्चम-प्रकारोक्त लोह-मारण विधि से बनायी हुई लोह- भस्म अर्शरोग को दूर करने के लिये विशेष गुणकारी मानी जाती है ॥६४-७१॥ षष्ठो मारणप्रकारः विमलं कान्तलोहं तु पलपञ्चकसंमितम् । पादिकं मृतमाक्षीकं दत्त्वा निम्बू कवारिणा ॥ ७२ ॥ सम्पेषयेत्प्रयत्नेन शुष्कचूर्णञ्च कारयेत् । सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटे ततः ॥ ७३ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा वस्त्रपूतञ्च कारयेत् । एवं पुटत्रयं दद्याद्रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ७४ ॥ माक्षिकञ्च प्रतिपुटमवश्यं दापयेत्ततः । स्थूलावशिष्टलोहञ्च पुटेदेवं प्रयत्नतः ॥ ७५ ॥ रक्तपित्तघ्नभैषज्यैर्यथालाभमथापि वा । धात्रीरसेन पुटयेद्यावन्मृतिमवाप्नुयात् ॥ ७६ ॥