रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 529, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें५०४ रसतरङ्गिणी इसके बाद केवल नींबू के रस से उक्त लोहभस्म को टिकिया बना गजपुट में तब तक पुट देते रहें जब तक कि वह उत्तम कमलपत्रवत् लालवर्ण की न हो जाय । इस तरह कुछ ही पुटों में लोह की उत्तम भस्म बन जाती है ॥ ५६-६० ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विमलं लौहचूर्णन्तु निम्बूकोत्थेन वारिणा । भृशं सम्पेष्य यत्नेन चक्रिकाः कारयेत्ततः ॥ ६१ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटेन तु । पञ्चाशद्भिः पुटैरेवं लौहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥ ६२ ॥ भस्म सञ्जायते चैवं रक्तोत्पलसमप्रभम् । एवं मृतं त्वायसन्तु सर्वत्र विनियोजयेत् ॥ ६३ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्धलोहचूर्ण को खरल में डाल नींबूरस के साथ दृढ़ मर्दन करके उसकी टिकियाएँ बना लें। अब इनको धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार पचास पुट देने से लोह की उत्तम भस्म बन जाती है। यह भस्म देखने में लाल कमल के सदृश वर्णवाली होती है। इसको सर्व कार्य में प्रयोग कर सकते हैं ॥ ६१-६३ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः [ गीतिका ] विमलन्तु लौहचूर्णं खलु सेटैकमानकम् । खरलोहखल्वमध्ये निदधीत वैद्यवर्यः ॥ ६४ ॥ अथ लौहभानतुल्यां दत्त्वा शिलां विशुद्धाम् । शालिञ्च मूलसलिलैः परिपेषयेन्त्रिकामम् ॥ ६५ ॥ प्रविधाय शुष्कचूर्णं त्वथ वै पुटेद् गजाख्ये । पुटयेत् मृच्छ्ररावद्वयमध्यगं ततोऽग्नौ ॥ ६६ ॥ समशुद्धनागजिह्वायुतमायसं त्रिधैवम् । पुटितं ततः प्रयाति त्वरितसूक्ष्मचूर्णभावम् ॥ ६७ ॥ परिपेष्य चाथ यत्नाद् विदधीत वस्त्रपूतम् । स्थूलावशिष्टलौहंशिलया पुनः पुटेद्वै ॥ ६८ ॥ त्रिफलार्द्रकाग्निभृङ्गद्वयहस्तिकर्णाकानाम् । कुलिशस्य सूरणस्य स्वरसेन चाग्निमुख्याः ॥ ६६ ॥