भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 528

विंशस्तरङ्गः ५०३ भा.टी.—उक्त भानुपाक और स्थालीपाक युक्त स्वच्छ लोहचूर्ण को समभाग शुद्धहिंगुल के साथ घीकुआर के रस में अच्छी तरह घोटकर धूप में सुखाकर चूर्ण करके एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूंक देवें। स्वांगशीत होने पर सम्पुट में से लोहचूर्ण निकाल उसमें लोहचूर्ण से बीसवाँ भाग शुद्ध हिंगुल मिला त्रिफलाक्वाथ अथवा भांगरे के स्वरस के साथ खूब अच्छी तरह घोटें और इसकी टिकिया-सी बनाकर सुखा लें। अब इनको पूर्ववत् सम्पुट में रखकर फिर गजपुट में फूंक देवें। इस प्रकार बीसवाँ भाग हिंगुल के साथ चालीस गजपुट देने से अवश्य ही लाल कमल के समान रक्तवर्ण की लोहभस्म हो जाती है। इस विधि से तीक्ष्णलोह अथवा कान्तलोह की भस्म की जा सकती है ॥ ५३-५५ ॥ वक्तव्य—कहीं पर बारहवां भाग हिंगुल डाल सात पुट देने से लोहभस्म बनाने को लिखा है। परन्तु इतने अल्प पुटों से लोहभस्म में उत्तम गुणोदय न होने से चालीस पुट देना ही अच्छा है। तृतीयो मारणप्रकारः [ गीतिका ] विमलीकृतन्तु लौहं खलु सेटकेकमानम् । विनिधाय खल्वमध्ये सममिङ्गुलीयचूर्णम् ॥ ५६ ॥ अथ निम्बूकोत्थवारा खलु पेषयेद् द्विघस्रम् । अथ पिष्टतां प्रयातं कृतचक्रिकञ्च लौहम् ॥ ५७ ॥ परिशोषयेन्निदाघे रसतन्त्रक्रमविज्ञः । विधिना त्रिवारमेवं पुटयेत्तु सम्पुटस्थम् ॥ ५८ ॥ अथ निम्बूकोत्थवारा खलु केवलेन पिष्टम् । पुटयेत्तु तावदेवं समुपैति पद्मकान्तिम् ॥ ५६ ॥ अचिरेण लौहमेवं मृतिमेति निर्विशेषम् । एवं मृतन्तु लौहं युञ्जीत निर्विशङ्कः ॥ ६० ॥ भा.टी.—एक सेर परिमाण में शुद्ध लोहचूर्ण लेकर उसको खरल में डालें और उसमें लोहचूर्ण के बराबर भाग शुद्ध हिंगुलचूर्ण भी डाल दें। अब इनको नींबू के स्वरस से दो दिन तक अच्छी तरह मर्दन करें। जब इसकी पीठी-सी बन जाय तो इसकी टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब इन लोह टिकियाओं को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूंक देवें। इस प्रकार तीन गजपुट देवें।