रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ रसतरङ्गिणी आ.टी.—सैन्धा, सौंचल और विडनमक को त्रिलवण, लवणत्रिक या लवणत्रय नाम से कहा जाता है ॥ ४ ॥ सैन्धवस्य मुख्यत्वम् तत्रापि सैन्धवं मुख्यं विद्वद्भिः परिकीर्तितम् । उक्ते लवणसामान्ये सैन्धवं विनियोजयेत् ॥५॥ मुख्यं नेत्र्यत्वाद् बहुगुणवत्त्वाच्च ॥५॥ भा.टी.--यद्यपि औषधि-प्रयोग में पाँचों नमक काम में आते हैं परन्तु इनमें सैन्धानमक मुख्य माना जाता है । अतः जहाँ पर केवल लवण शब्द लिखा हो वहाँ सैन्धानमक ही लेना चाहिये ॥ ५ ॥ क्षारद्वयं क्षारत्रिकञ्च स्वर्ज्जिक्षारो यवक्षारः क्षारद्वयमुदाहृतम् । सौभाग्येन समायुक्तं क्षारत्रिकमुदाहृतम् ॥६॥ क्षारपञ्चकम् मुष्कक्षारो यवक्षारः किंशुकक्षार एव च । स्वर्ज्जिक्षारस्तिलक्षारः क्षारपञ्चकमुच्यते ॥७॥ किंशुकक्षारः = पलाशक्षारः ॥ ६, ७ ॥ भा.टी.-सजीखार और जवाखार को क्षारद्वय शब्द से कहा जाता है । इन दोनों के साथ सुहागा भी हो तो इसको क्षारत्रिक शब्द से कहा जाता है ॥६॥ पाढल क्षार, जवाखार, ढाकक्षार, सजीखार और तिलक्षार को क्षार- पंचक शब्द से कहा जाता है ॥ ७ ॥ क्षाराष्टकम् सुधापलाशशिखरचिञ्चार्कतिलनालजाः । स्वर्जिका यावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥८॥ सुधा स्नुही, शिखरी अपामार्गः ॥ ८ ॥ भा.टी.--थोहर, ढाक, अपामार्ग, इमली, आक, तिल के डंठल के क्षार, सजीखार और जवाखार को क्षाराष्टक शब्द से कहा जाता है ॥ ८ ॥ मूत्राष्टकम् सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् । मूत्राणीति भिषग्वर्यैर्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥६॥ खरेभोष्ट्रतुरङ्गाणां पुंसां मूत्रं प्रशस्यते ।