रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयस्तरङ्गः १३ गोजाविमहिषीणाञ्च मूत्रं स्त्रीणां हितं मतम् ॥१०॥ निखिलेष्वपि मूत्रेषु गोमूत्रं गुणवत्तमम् । अतो विशेषानुक्तौ तु गोमूत्रं विनियोजयेत् ॥११॥ सैरिभी महिषी, करभः = उष्ट्रः, द्विपः = हस्ती ॥ ६-११ ॥ भा.टी.—भैंस, बकरी, भेड़, ऊँट, गाय, गधा, हाथी और घोड़े के मूत्रों को मूत्राष्टक शब्द से कहा जाता है। इनमें से गधा, हाथी, ऊँट और घोड़े का पुरुष जाति का मूत्र और गाय, बकरी, भेड़ और भैंस का मूत्र लेना हो तो स्त्री जाति का मूत्र लेना चाहिये । सब मूत्रों में गोमूत्र विशेष गुणवाला होता है अतः जहाँ किसी विशेष मूत्र का वर्णन न हो किन्तु केवल मूत्र शब्द ही लिखा हो तो वहाँ पर गोमूत्र का ही प्रयोग करना चाहिये । कहीं-कहीं मनुष्य- मूत्र का भी प्रयोग होता है ॥ ६-११ ॥ गोर्वरम् गोखुरैस्ताडितं गोष्ठे शुष्कं चूर्णोपमञ्च यत् । गोमयं तत्समाख्यातं बुधैर्गोर्वरसंज्ञकम् ॥१२॥ गोष्ठे = गोनिवासस्थले ॥ १२ ॥ भा.टी.--गोशाला या गाय बाँधने की जगह में गाय के खुरों से पिच- कर टूट-टूट करके सूखने के बाद मोटे चूर्ण के समान हुए गोबर को गोमय या गोर्वर शब्द से कहा जाता है ॥ १२ ॥ अम्लवर्गः जम्बीरं निम्बुकञ्चैव त्वम्लवेतसमम्लिका । नारङ्गं दाडिमञ्चैव वृक्षाम्लं बीजपूरकम् ॥१३॥ चाङ्गेरी चणकाम्लञ्च कर्कन्धुः करमर्दकः । चुक्रिका चेति सामान्यादम्लवर्गः प्रकीर्तितः ॥१४॥ वृक्षाम्लं = तिन्तिडीकम् , कर्कन्धुः = बदरीफलम् , चुक्रिका "चूका" इति ख्याता ॥ १३, १४ ॥ भा.टी.—जम्बीरी नींबू, कागजी नींबू, अमलवेत, इमली, नारंगी, दाड़िम, विषांविल, बिजौरा नींबू, चने का क्षार, खट्टा बेर, करौंदा और चूका; इन सब को सामान्यरूप से "अम्लवर्ग" के नाम से लिया जाता है । अर्थात् जहाँ कहीं अम्लवर्ग से मर्दन भावना आदि लिखा हो इन द्रव्यों के रस को लेना चाहिये ॥ १३, १४ ॥