रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशस्तरङ्गः ५१५ भस्म-को गन्धकयोग से बनायी हुई ताम्रभस्म में मिलाकर बला तथा कौंच की जड़ के कपाय के साथ सेवन करने से सर्वांग तथा एकांग की वातव्याधि नष्ट हो जाती है। कान्तलोहभस्म को आँवलों के स्वरस के साथ एक वर्ष तक निरन्तर सेवन करने से आयु दीर्घ होती है ॥ ६६-११७ ॥ प्रदरान्तकलोहः लौहं द्वितोलकमितं रङ्गं तोलकसंमितम् । सुवर्णगैरिकञ्चैव गव्याज्यपरिपाचितम् ॥ ११८ ॥ श्वेतसर्जरसोद्भूतं चूर्णं कर्षद्वयोन्मितम् सुचूर्णितं मोचरसं तोलकैकमितं शुभम् ॥ ११९ ॥ समादाय भिषग्वर्यः काचकूप्यां निधापयेत् । प्रदरान्तकलोहोऽयं नामतः परिकीर्तितः ॥ १२० ॥ अनुपानविभेदेन सर्वप्रदरनाशनः । रक्तचन्दनक्वाथैर्वाऽशोकत्वक्कषायतः ॥ १२१ ॥ निहन्ति रक्तप्रदरं विविधस्रावसंयुतम् । श्वेतचन्दनपङ्केन श्वेतप्रदरनाशनः ॥ १२२ ॥ प्रदरान्तकलोहः—सर्जरसो रालः, मोचरसं शाल्मलीवेष्टम्, त्रिगुञ्जामिताऽस्य मात्रा प्रायः । स्पष्टमन्यत् ॥ ११८–१२२ ॥ भा.टी.—उत्तम लोहभस्म दो तोला, वंगभस्म एक तोला, शुद्ध सोना गेरू (गोधृत में भुना हुआ) एक तोला, सफेद राल का चूर्ण चार तोला, मोचरसचूर्ण एक तोला लेकर सब को एकत्र खरल में अच्छी तरह पीसकर काँच की शीशी में रख लें। इस योग को प्रदरान्तक रस नाम से कहा जाता है। यह रस विभिन्न अनुपान योग से सब प्रकार के प्रदर रोग को नष्ट करता है । अनेकविध स्राव- युक्त रक्तप्रदर में इस रस को लालचन्दन के शीत कषाय अथवा अशोकत्वक- कपाय के साथ देने से शीघ्र आराम आता है । श्वेतप्रदर के लिये इस रस को सफेदचन्दन के कल्क के साथ दिया जाता है ॥ ११८–१२२ ॥ अथ मण्डूरस्य स्वरूपम् प्रतापितस्य लोहस्य घनाघातच्युतं मलम् । कालेन पिण्डतां याति क्षितौ, मण्डूरमुच्यते ॥ १२३ ॥ भा.टी.—लौह को तपाने पर जब उसमें बड़े-बड़े हथौड़ों की चोट लग